खजाने के सपने का उपहास ,सरकार ने gsi asi के आधार पर निर्णय लिया
उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के डौडिया खेड़ा गांव में शुक्रवार को खजाने की तलाश में उस खंडहरनुमा किले में खुदाई शुरू की गई, जिसके नीचे 1000 टन सोना दबे होने का दावा किया गया है। पुरातत्व अधिकारियों को पहले दिन खुदाई में कुछ हाथ नहीं लगा। पूरे इलाके में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं।
उन्नाव के जिलाधिकारी केएस आनंद ने कहा, “भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और जियोलजिकल सर्वे आफ इंडिया (जीएसआई) के अधिकारियों की टीम ने खुदाई शुरू करवा दी है। खुदाई में 30 से 40 दिन का समय लग सकता है।”
पहले दिन शाम पांच बजे तक केवल पांच मीटर क्षेत्र में करीब छह इंच गहरी खुदाई हो सकी। शनिवार को सुबह दस बजे से फिर से खुदाई का काम शुरू होगा।
खुदाई से पहले सुबह जिलाधिकारी ने एएसआई और जीएसआई अधिकारियों के साथ खुदाई के तरीकों और सुरक्षा को लेकर बैठक की। बैठक के बाद दोपहर 12 बजे खुदाई का काम शुरू हुआ। इससे पहले साधुओं द्वारा भूमि पूजन किया गया।
किले में जिस जगह पर खुदाई होनी थी, उसे चिह्नित कर चारों तरफ घेराबंदी कर दी गई। मीडिया को घेरे से आगे जाने की इजाजत नहीं दी जा रही है। इलाके में देसी और विदेशी मीडियाकर्मियों का भारी जमावड़ा है।
खुदाई में कितना समय लगेगा? सोना जमीन में कहां पर और कितने नीचे दबा है? इस तरह के तमाम सवाल लोगों के मन में हैं, जिनका जवाब फिलहाल खुद एएसआई के अधिकारियों के पास भी नहीं है।
उन्नाव के अपर पुलिस अधीक्षक सर्वानंद सिंह ने संवाददाताओं को बताया कि किले और आसपास सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हैं। पुलिस के साथ प्रांतीय सशस्त्र बल (पीएसी) के लगभग 50 जवानों की तैनाती की गई है।
राजा राव रामबक्श का किला एक हजार टन खजाने के कारण इन दिनों दुनिया की नजरों में है
उन्नाव के बक्सर स्थित डौडिया खेड़ा में राजा राव रामबख्श सिंह के किले में खजाने की बात संत शोभन सरकार ने कही है। बक्सर से एक किलोमीटर दूर अपने आश्रम में सरकार ने तीन महीने पहले सपना देखा कि 1857 में अग्रेजों से लड़ाई में शहीद हुए राजा के किले के नीचे खजाना दबा है। शोभन सरकार ने तीन सितंबर को स्थानीय प्रशासन, राज्य सरकार और केंद्र सरकार को इस बारे में अवगत कराया।
बताया जा रहा है कि केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण राज्यमंत्री चरण दास महंत ने सितंबर के आखिरी सप्ताह में खजाना दबा होने का दावा करने वाले संत शोभन सरकार के साथ किले का दौरा किया था।
तीन अक्टूबर को एएसआई के लखनऊ मंडल के अधिकारियों की एक टीम ने स्थानीय प्रशासन के अधिकारियों के साथ किले का दौरा किया।
सूत्रों के मुताबिक, एएसआई अधिकारियों की टीम को मौके पर सर्वेक्षण के बाद किले के 20-25 फुट नीचे धातु के दबे होने के कुछ संकेत मिले। विचार-विमर्श के बाद एएसआई अधिकारियों ने 18 अक्टूबर से खुदाई किए जाने का निर्णय लिया।
इतिहासकार दावा कर रहे हैं कि किले की जमीन में इतनी मात्रा में सोना मिलना मुश्किल है, क्योंकि राजा राव रामबख्श सिंह इतने बड़े और वैभवशाली शासक नहीं थे। वहीं स्थानीय लोग शोभन सरकार की बात को सच मान रहे हैं।
दूसरी तरफ, अभी सोना निकला नहीं है लेकिन इसके कई दावेदार सामने आ गए हैं। समाजवादी पार्टी (सपा) के वरिष्ठ नेता नरेश अग्रवाल और उत्तर प्रदेश सरकार के राज्यमंत्री सुनील यादव ने कहा कि खुदाई में जो निकलेगा वह उत्तर प्रदेश सरकर की सम्पत्ति होगी।
वहीं इलाके के ग्राम प्रधान अजयपाल सिंह ने कहा, “सोना निकलता है तो इससे हमारे क्षेत्र का विकास किया जाए।” वहीं खुद को राजा का वंशज बताने वाले राजेश कुमार सिंह ने कहा कि ‘खजाने से सरकार हमें पुनर्स्थापित करने का काम करे।’
त्रिशूल की कहानी
संत शोभन सरकार ने यहां के डौंडिया खेड़ा स्थित किले के गर्भ में खजाना दबे होने का दावा तो किया है लेकिन उसकी असल कहानी का सीधा रिश्ता किले के मुख्यद्वार के बाहर बाईं ओर स्थित बाबूजी राव शिवाला से भी जुड़ा बताया जाता है। राजा राव रामबक्श सिंह ने पूजा करने के लिए किले के मुख्य द्वार के पास विशाल शिव मंदिर बनवाया था। इसे बाबूजी राव शिवाला के नाम से जाना जाता है।
किले के गुंबद पर त्रिशूल आज भी सुशोभित है। वैसे तो अधिकांश शिव मंदिरों के शिखर पर त्रिशूल होता है, लेकिन इस मंदिर का त्रिशूल इतिहास समेटे है। खजाने का राज भी इससे जुड़ा है। किवदंती भी है कि सूरज की पहली किरण जब त्रिशूल पर पड़ती है तो मंदिर ऊंचा होने के कारण त्रिशूल की छाया किले में बने कुएं के पास पड़ती है। राजा ने खजाने को सुरक्षित रखने के लिए इसी स्थान को चुना, ताकि कभी स्थान को लेकर किसी तरह की भूल या भ्रम न हो। कोई देखरेख न होने के कारण किले में भारी भरकम बबूल के पेड़ के साथ झाड़ियां उग आई हैं, लेकिन त्रिशूल आज भी खजाने के स्थान की शान से गवाही दे रहा है।
खजाने की खोज के लिए खुदाई में लगी टीम के प्रभारी आर्कियोलॉजिकल आफ इंडिया के पीके मिश्र का कहना है कि उनकी टीम सर्वे की रिपोर्ट के आधार पर खुदाई का काम कर रही है। इसके अलावा कोई और दूसरा कारण नहीं है। अब इसे महज संयोग कहें या फिर कुछ और लेकिन खुदाई उसी दस फिट के हिस्से से शुरू की गई है, जहां त्रिशूल की छाया सूर्य की पहली किरण के साथ पड़ती है। गांव के शांति स्वरूप एवं रामकेवल भी बताते हैं कि पूर्वज से खजाना और त्रिशूल का रिश्ता सुनते आए हैं।





















