महात्मा गांधी भारत की स्वाधीनता स्वतंत्रता आंदोलन के शीर्ष नेतृत्व तथा प्रतीक थे
जिसमें पूरा भारतवर्ष देश तथा समाज सम्मिलित थे
वस्तुतः स्वाधीनता संग्राम १८५७ के पूर्व से चला आ रहा था जिसमे विभिन्न क्रांतिकारी , आजादी के दीवाने , विचारक लेखक उद्धेलक मनीषी , राष्ट्रप्रेम की भावना देशवासियों के मन में सतत स्थापित प्रेरित करते रहते थे,
सभी गुलामी को बदतर मानते थे और आजादी से सांस लेना चाहते थे
लेकिन पहले कंपनी राज और पश्चात में सीधे क्राउन राज की महाशक्ति के कारण आवाज उठाने वाले लोग , विद्रोह कुचल दिए जाते रहे ,
जिससे सेंकड़ो वर्षों से आततायियों के क्रूर शोषण उत्पीड़न से प्रताड़ित मानवता कराह रही थी ,
सभी सहमे हुए से दुबके थे कोई आवाज उठाने का साहस नहीं कर पा रहा था ,
ऐसे में वकील फिर न्यायाधीश महादेव गोविंद रानाडे जो की वेदों, सनातन ऋषि मुनियों से प्रेरित रहे , स्वामी विवेकानंद – शंकराचार्य और स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारो से प्रभावित होकर प्रार्थना समाज के माध्यम से जनजागृति अभियान चलाया करते थे, उनसे प्रभावित होकर गोपालकृष्ण गोखले, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक आदि अनेकों महापुरुष जनजागृति के माध्यम से समाज को संगठित करते हुए देश में स्वतंत्रता संग्राम की विचार धारा को बल प्रदान किया करते थे ,
इसी रानाडे – गोखलें – तिलक की परंपरा में एक छात्र मोहनदास कर्मचंद गांधी भी सम्मिलित हुए ,
संयोग से वे विदेशों में पड़े लिखे और वकालत की प्रेक्टीस भी किये हुए क़ानून के जानकार होने से मानव अधिकारो की समझ रखने वाले , समानता और न्याय के हिमायती थे ,
जिससे कि उनके मन मस्तिष्क में , विदेशो में भी भारतीयो और अन्य काले लोगों के प्रति गोरों के अत्याचार , अंग्रेजों के दुराग्रह के प्रति अत्याधिक उत्पीड़न दुर्व्यवहार के अनुभव जड़ जमा चुके थे , मन में अन्याय व् शोषण के विरुद्ध विद्रोह की भावना प्रबल हो उठी थी,
लेकिन कुछ समय में वह यह भी समझ चुके थे कि यदि सशस्त्र संघर्ष करने का प्रयत्न किया जाता है तो इसके लिए न तो देश में समाज के भीतर सक्षमता है और न ही सेंकड़ो वर्षों के विधर्मी गुलामी उपरांत, मनोबल शक्ति और व्यापक सहमति ही,
अतः गांधी ने तत्कालीन संघर्षरत लोगो, स्वतंत्रता सेनानियो से समन्वय परामर्श कर , समाज की ताकत का विश्लेषण कर, यथार्थ स्थिति की समीक्षा कर,सर्व स्वीकार्यता के आधार पर
देशवासियों व समाज की कमजोरी को ही स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा हथियार बनाया ,
यह था
असहयोग सविनय अवज्ञा और सत्याग्रह
एक तरफ़ इसमें अधिकांश देशवासी विना किसी अस्त्र शस्त्र के सम्मिलित हो सकते थे ,
और एक तरह से राष्ट्र के स्वाधीनता आंदोलन में ऐच्छिक स्व योगदान , आहुति देने में यह लोगो को सरलता से सक्षम भी बनाता था,
सशस्त्र क्रांतिकारी तथा अन्य विचारधारा वाले अपना काम अलग से कर ही रहे थे ,
शिक्षक लेखक कवि पत्रकार विचारक अपनी अपनी लेखनी से स्वातंत्र्य के लिए लोगो को लगातार प्रेरित करते रहे ,
चूँकि सविनय अवज्ञा और सत्याग्रह कोई हिंसक आन्दोलन नहीं था
और यह भारतीय समाज की प्राचीन परिकल्पना सिद्धान्तों मूल्यों से संगत भी था,
अतः इसका समर्थन घोषित तौर पर भी करना मनीषियों के लिए सरल सहज रहा,
वहीं स्वाधीनता संग्राम के विरोधियो या अंग्रेज़ों से युद्ध करने के अनिच्छुक विचार के लोग भी शांतिपूर्ण सत्याग्रह सविनय अवज्ञा का विरोध सीधे तौर पर नहीं कर सकते थे , यहाँ तक कि अंग्रेज़ नागरिक और अन्य विदेशी नागरिकों द्वारा , दुनिया के सभ्य समाज द्वारा इसका सीधा विरोध नहीं किया जा सकता था,
इसका एक बड़ा परिणाम यह निकला कि हर घर से एक व्यक्ति आंदोलन में सम्मिलित हुआ , लोगो के असहयोग और सविनय अवज्ञा से मुट्ठी भर अंग्रेज़ शासन प्रशासन चलाने में असहयोग का सामना करने लगे, धीरे धीरे इनकी संख्या बढ़ती गई,शांतिपूर्ण सत्याग्रह में पुलिस सेना से निरंतर लाठीचार्ज से लोगो के मन में अंग्रेज़ हुकूमत का डर ख़त्म हो गया और विरोध करने की व्यापकता तेज़ी से बड़ी, प्रत्येक परिवार से कम से कम एक व्यक्ति सशस्त्र विद्रोह के समर्थकों को भी अंडरग्राउंड मदद करता रहा,
इसी बड़ी वजह से रानाडे गोखले तिलक परंपरा के छात्र अनुयायी मूलतः एक आध्यात्मिक नेता मोहनदास करमचंद गांधी
राष्ट्र समाज को स्वतंत्रता के लिए अधिक प्रेरित कर संगठित समर्पित करा पाए
सशस्त्र क्रांति की चाह रखने वाले वीर सेनानियों की संख्या अत्यंत अल्प और सीधा विधि विरुद्ध होने से कुचला जाना आसान था अतः उन्हें देशवासियों का खुला समर्थन व सक्रिय सहयोग उतना नहीं मिल सका ,
अंततोगत्वा राष्ट्रवादियो देशवासियों और स्वाधीनता संग्राम के अधिकांश नेतृत्वकर्ताओं को स्वाभाविक तौर से मोहनदास करमचंद गांधी का मार्ग सहज सरल अनुकूल होने से पसंद आया
और वो व्यापक हो, सफल सार्थक एवम प्रभावी रहा ,
यह नहीं कि मात्र गांधी मार्ग ही उपयोगी या प्रचलित रहा ,
अनेकों अनेक मार्ग सिद्धांत और प्रक्रियाये आज भी राष्ट्र समाज विश्व में प्रचलित हैं , तत्समय भी अपनायी गई ,
किंतु देश ने इसे प्रबल मत से स्वीकारा ,
संविधान सभा के ३०० से अधिक मनीषी जो तत्समय सम्पूर्ण समाज, देश के किसी न किसी व्यापक समूह का प्रतिनिधित्व करते थे ,इस मत को मान्यता देते हुए संविधान का निर्माण किया ,
आजादी मिलने के उपरांत गांधी की भूमिका पर मत मतान्तर रहे है , उसके लिए द्विराष्ट्र सिद्धांत , पूना पैक्ट , आजादी प्राप्त करने की शर्तों को , तत्समय की व्यावहारिक स्थिति और तत्कालीन विरोधाभासी विचार समझना होगा , जिसमे कि गांधी से कुछ असहमति भी संभव है ,
कुल मिलाकर गांधी के विचार, सर्वसमाहित समावेशी सार्वभौमिक होकर सनातन सिद्धांतों के प्रतिबिंब है, अतः सम्पूर्ण विश्व मानवता के लिए सदैव प्रासंगिक बने रहेंगे ।
शुभ गांधी जयंती






















