राहुल गांधी (जन्म:19 जून 1970) एक महान भारतीय नेता और भारत की संसद के सदस्य हैं और भारतीय संसद के निचले सदन लोकसभा में केरल में स्थित वायनाड चुनाव क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं।
राहुल गांधी १६ दिसंबर २०१७ को हुई औपचारिक ताजपोशी के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे।
राहुल भारत के प्रसिद्ध गांधी-नेहरू परिवार से हैं।
राहुल को 2009 के आम चुनावों में कांग्रेस को मिली बड़ी राजनैतिक जीत का श्रेय दिया गया है।
उनकी राजनैतिक रणनीतियों में जमीनी स्तर की सक्रियता पर बल देना, ग्रामीण जनता के साथ गहरे संबंध स्थापित करना और कांग्रेस पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करने की कोशिश कर प्राण फूंकना प्रमुख हैं, पर वे उसमें असफल रहे।
पूर्व अध्यक्ष, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC)
16 दिसम्बर 2017 –
3 अगस्त 2019
अध्यक्ष, भारतीय युवा कांग्रेस
25 सितम्बर 2007
अध्यक्ष, नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ़ इण्डिया
25 सितम्बर 2007 – 2017
सांसद, लोकसभा
23 मई 2019चुनाव-क्षेत्रवायनाड, केरलजन्म19 जून 1970
(आयु 51)
नई दिल्ली, भारत
राष्ट्रीयता भारतीय
राजनीतिक दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
संबंध नेहरू–गांधी परिवार
शैक्षिक सम्बद्धता सेंट स्टीफ़ेन्स कॉलेज, दिल्ली , हार्वर्ड विश्वविद्यालय रॉलिन्स कॉलेज, ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज
धर्म हिन्दु
जालस्थल rahulgandhi.in
प्रारम्भिक जीवन
राहुल गांधी का जन्म 19 जून 1970 को नई दिल्ली में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और पूर्व काँग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी के यहां हुआ था।
वह अपने माता-पिता की दो संतानों में बड़े हैं और प्रियंका गांधी वढेरा के बड़े भाई हैं। राहुल गांधी की दादी इंदिरा गांधी भारत की पूर्व प्रधानमंत्री थीं।
राहुल गांधी की प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल में की और इसके बाद वो प्रसिद्ध दून विद्यालय में पढ़ने चले गये जहां उनके पिता ने भी विद्यार्जन किया था।
सन 1981-83 तक आतंकी खतरों से सुरक्षा कारणों के कारण राहुल गांधी को अपनी पढ़ाई घर से ही करनी पड़ी।
राहुल ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के
रोलिंस कॉलेज फ्लोरिडा से सन 1994 में कला स्नातक की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद सन 1995 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज से
एम.फिल. की उपाधि प्राप्त की।
शुरूआती कैरियर
स्नातक स्तर तक की पढ़ाई कर चुकने के बाद राहुल गांधी ने प्रबंधन गुरु माइकल पोर्टर की प्रबंधन परामर्श कंपनी मॉनीटर ग्रुप के साथ 3 साल तक काम किया। इस दौरान उनकी कंपनी और सहकर्मी इस बात से पूरी तरह से अनभिज्ञ थे कि वे किसके साथ काम कर रहे हैं क्योंकि राहुल यहां सुरक्षा कारणों से खुफिया एजेंसियों की सलाह पर एक छद्म नाम रॉल विंसी के नाम से इस कम्पनी में नियोजित थे। राहुल गाँधी के आलोचक उनके इस कार्य को तोड़ मरोड़कर अनावश्यक भ्रम फैलाते है।
सन 2002 के अंत में वह मुंबई में स्थित अभियांत्रिकी और प्रौद्योगिकी से संबंधित एक कम्पनी ‘आउटसोर्सिंग कंपनी बैक अप्स सर्विसेस प्राइवेट लिमिटेड’ के निदेशक-मंडल के सदस्य बन गये।
राजनीतिक कैरियर
2003 में, राहुल गांधी के राष्ट्रीय राजनीति में आने के बारे में बड़े पैमाने पर मीडिया में अटकलबाजी का बाज़ार गर्म था, जिसकी उन्होंने तब कोई पुष्टि नहीं की। वह सार्वजनिक समारोहों और कांग्रेस की बैठकों में बस अपनी माँ के साथ दिखाई दिए। एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट श्रृंखला देखने के लिए सद्भावना यात्रा पर अपनी बहन प्रियंका गाँधी के साथ पाकिस्तान भी गए। जिसकी भी हिंदूवादी आलोचना करते है।
जनवरी 2004 में राजनीति उनके और उनकी बहन के संभावित प्रवेश के बारे में अटकलें बढ़ीं जब उन्होंने अपने पिता के पूर्व निर्वाचन क्षेत्र अमेठी का दौरा किया, जहाँ से उस समय उनकी माँ सांसद थीं। उन्होंने यह कह कर कि “मैं राजनीति के विरुद्ध नहीं हूँ। मैंने यह तय नहीं किया है कि मैं राजनीति में कब प्रवेश करूँगा और वास्तव में, करूँगा भी या नहीं।” एक स्पष्ट प्रतिक्रिया देने से मना कर दिया था।
मार्च 2004 में, मई 2004 का चुनाव लड़ने की घोषणा के साथ उन्होंने भारतीय राजनीति में प्रवेश की घोषणा की, वह अपने पिता के पूर्व निर्वाचन क्षेत्र उत्तरप्रदेश के अमेठी से लोकसभा चुनाव के लिए खड़े हुए, जो भारत की संसद का निचला सदन है।
इससे पहले, उनके चाचा संजय गांधी ने, जो एक विमान दुर्घटना के शिकार हुए थे, ने संसद में इसी क्षेत्र का नेतृत्व किया था। तब तक इस लोकसभा सीट पर प्रतिनिधि उनकी माँ थी, जब तक वह पड़ोस के निर्वाचन-क्षेत्र रायबरेली स्थानान्तरित नहीं हुई थी।
उस समय इनकी पार्टी ने राज्य की 80 में से महज़ 10 लोकसभा सीट ही जीतीं थीं और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का हाल बुरा था।
इससे राजनीतिक टीकाकारों को थोड़ा आश्चर्य भी हुआ जिन्होंने राहुल की बहन प्रियंका गाँधी में करिश्मा कर सकने और सफल होने की संभावना देखी थी। पर तब पार्टी के अधिकारियों के पास मीडिया के लिए उनका बायोडेटा तक तैयार नहीं था।
ये अटकलें लगाई गयीं कि भारत के सबसे मशहूर राजनीतिक परिवारों में से एक देश की युवा आबादी के बीच इस युवा सदस्य की उपस्थिति कांग्रेस पार्टी के राजनीतिक भाग्य को पुनर्जीवन देगी।
विदेशी मीडिया के साथ अपने पहले इंटरव्यू में, उन्होंने स्वयं को ‘देश को जोड़ने वाली शख्सियत’ के रूप में पेश किया और भारत की “विभाजनकारी” राजनीति की निंदा की, यह कहते हुए कि वह जातीय और
धार्मिक तनाव को कम करने की कोशिश करेंगे। उनकी उम्मीदवारी का स्थानीय जनता ने उत्साह के साथ स्वागत किया, जिनका इस क्षेत्र में इस गाँधी-परिवार से एक लंबा संबंध था।
वह चुनाव विशाल बहुमत से जीते, वोटों में 1,00,000 के अंतर के साथ इन्होंने अपने चुनाव क्षेत्र को परिवार का गढ़ बनाए रखा, जब कांग्रेस ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को अप्रत्याशित रूप से हराया।
उनका अभियान उनकी छोटी बहन, प्रियंका गाँधी द्वारा संचालित किया गया था।
2006 तक उन्होंने कोई अन्य पद ग्रहण नहीं किया और मुख्य निर्वाचन क्षेत्र के मुद्दों और उत्तर प्रदेश की राजनीति पर ध्यान केंद्रित किया और भारतीय और अंतरराष्ट्रीय प्रेस में व्यापक रूप से अटकलें थी कि सोनिया गांधी भविष्य में उन्हें एक राष्ट्रीय स्तर का कांग्रेस नेता बनाने के लिए तैयार कर रही हैं, जो बात बाद में सच साबित हुई।
जनवरी 2006 में, हैदराबाद में
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक सम्मेलन में, पार्टी के हजारों सदस्यों ने गांधी को पार्टी में एक और महत्वपूर्ण नेतृत्व की भूमिका के लिए प्रोत्साहित किया और प्रतिनिधियों के संबोधन की मांग की। उन्होंने कहा, “मैं इसकी सराहना करता हूँ और मैं आपकी भावनाओं और समर्थन के लिए आभारी हूँ. मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं आपको निराश नहीं करूँगा” लेकिन उनसे इस बारे में धैर्य रखने को कहा और पार्टी में तुरंत एक उच्च पद लेने से मना कर दिया। इस प्रकार उन्होंने पदलोलुप नही होना सिद्ध कर दिया।
राहुल गांधी और उनकी बहन ने 2006 में रायबरेली में पुनः सत्तारूढ़ होने के लिए उनकी माँ सोनिया गाँधी का चुनाव अभियान हाथ में लिया, जो आसानी से 4,00,000 मतों से अधिक अंतर के साथ जीती थीं।
2007 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए एक उच्च स्तरीय कांग्रेस अभियान में उन्होंने प्रमुख भूमिका अदा की ; हालाँकि कांग्रेस ने 8.53% मतदान के साथ केवल 22 सीटें ही जीतीं। इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को बहुमत मिला, जो पिछड़ी जाति के भारतीयों का प्रतिनिधित्व करती है।
राहुल गांधी को 24 सितंबर 2007 में पार्टी-संगठन के एक फेर-बदल में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का महासचिव नियुक्त किया गया था। उसी फेर-बदल में, उन्हें युवा कांग्रेस और
भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ का कार्यभार भी दिया गया था।
एक युवा नेता के रूप में खुद को साबित करने के उनके प्रयास में नवम्बर 2008 में उन्होंने नई दिल्ली में अपने 12, तुगलक लेन स्थित निवास में कम से कम 50 अलग अलग क्षेत्र के प्रतिभावान बुद्धिमान योग्य लोगों को ध्यानपूर्वक चुनने के लिए साक्षात्कार आयोजित किया, जो भारतीय युवा कांग्रेस (IYC) के वैचारिक-दस्ते के हरावल बनेंगे,
जब से वह सितम्बर 2007 में महासचिव नियुक्त हुए हैं तब से इस संगठन को परिणत करने के इच्छुक दिखाई देते रहै हैं।
2009 चुनाव
2009 के लोकसभा चुनावों में, उन्होंने उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 3,33,000 वोटों के अन्तर से पराजित करके अपना अमेठी निर्वाचक क्षेत्र बनाए रखा। इन चुनावों में कांग्रेस ने कुल 80 लोकसभा सीटों में से 21 जीतकर उत्तर प्रदेश में खुद को पुनर्जीवित किया और इस बदलाव का श्रेय भी राहुल गांधी को ही दिया गया है।
छह सप्ताह में देश भर में उन्होंने 125 रैलियों में भाषण दिया था।
पार्टी-वृत्त में वह ‘आरजी’ और विरोधियों में रागा के नाम से जाने जाते हैं।
राजनीतिक और सामाजिक मत आलोचना
जब 2006 के आखिर में न्यूज़वीक ने इल्जाम लगाया की उन्होंने हार्वर्ड और कैंब्रिज में अपनी डिग्री पूरी नहीं की थी या मॉनिटर ग्रुप में काम नहीं किया था, तब राहुल गांधी के कानूनी मामलों की टीम ने संबंधित न्यूज मैगजीन को एक कानूनी नोटिस भेजा, जिसके बाद वह मैगजीन जल्दी से राहुल के विरुद्ध दिए गए बयान से मुकर गए और क्षमा मांग उसे दुरुस्त किया ।
राहुल गांधी ने 1971 में पाकिस्तान के टूटने को, अपने परिवार की “सफलताओं” में गिना.
इस बयान ने पाकिस्तानी नेताओ के साथ ही भारत में कई राजनीतिक दलों को विचलित कर दिया ।
मुस्लिम इतिहासकार इरफान हबीब ने कहा की यह टिप्पणी “..बांग्लादेश आंदोलन का अपमान था।
2007 में उत्तर प्रदेश के चुनाव अभियान के दौरान राहुल ने विवादास्पद बयान देकर उत्तरप्रदेश और देश से कांग्रेस की हार सुनिश्चित कर दी, उन्होंने कहा की “यदि कोई गांधी-नेहरू परिवार से राजनीति में सक्रिय होता तो, बाबरी मस्जिद नहीं गिरी होती”.
इसे पी वी नरसिंह राव पर हमले के रूप में भी व्याख्या किया गया था, जो 1992 में मस्जिद के विध्वंस के दौरान प्रधानमंत्री थे। और देश के बहुसंख्यक हिन्दू नरसिंह राव को योग्य सक्षम व विद्वान नेता के तौर पर मानते है।
राहुल गांधी के बयान ने बहुसंख्यक हिंदुओ का रुझान भाजपा की और मोड़ा।
वही मुसलमान भी नरसिंह राव की हिंदूवादी नीतिओ से खफा होकर समाजवादी पार्टी और वाम का हाथ मजबूती से थाम चुके थे।
इस प्रकार राहुल गांधी के अदूरदर्शिता पूर्ण बयान, कार्यशैली और कार्यप्रणाली से उन पर “हिन्दू विरोधी” होने का ठप्पा आसानी से लग गया।
साफ सुथरी धर्मनिरपेक्ष राजनीति के हिमायती दिखाने के फेर में, शायद नासमझ या मासूम राहुल निरंतर विपक्षियो की कुटिल चालो में फसते चले गए।
2008 के आखिर में, राहुल गांधी पर लगी एक स्पष्ट रोक से उनकी प्रबल मानसिक शक्ति का भी पता चला। मुख्यमंत्री मायावती ने राहुल गांधी को चंद्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय में छात्रों को संबोधित करने के लिए सभागार का उपयोग करने से रोक दिया।
बाद में, राज्य के राज्यपाल श्री टी.वी.राजेश्वर (जो कुलाधिपति भी थे) ने विश्वविद्यालय के कुलपति वी.के.सूरी को हटा दिया।
टी.वी.राजेश्वर गांधी परिवार के समर्थक और श्री सूरी के नियोक्ता थे।
इस घटना को शिक्षा में राजनीति के साक्ष्य, व वंशवाद के रूप में उद्धृत किया गया।
सेंट स्टीफेंस कॉलेज में उनका दाखिला एक प्रतिस्पर्धात्मक
पिस्तौल
निशानेबाज़ के रूप में उन्हें उनकी क्षमताओं के आधार पर प्राथमिकता देकर भर्ती किया गया था,
जिसे विपक्ष ने जोर शोर से विवादित करने में कोई कसर नही छोड़ी।
बहरहाल उन्होंने शिक्षा के एक वर्ष के बाद 1990 में उस कॉलेज को छोड़ दिया था।
उनका बयान कि अपने कॉलेज सेंट स्टीफंस में उनके एक वर्ष के निवास के दौरान, कक्षा में सवाल पूछने वाले छात्रों को “छोटा समझा जाता था”, इस पर कॉलेज प्रशासन की तरफ से एक तीव्र प्रतिक्रिया हुई। कॉलेज-प्रबंधन ने कहा कि जब वह सेंट स्टीफेंस कॉलेज में पढ़ाई कर रहे थे, तब सवाल पूछना कक्षा में अच्छा नहीं माना जाता था और ज्यादा सवाल पूछना तो और भी नीचा माना जाता था। महाविद्यालय के शिक्षकों ने कहा कि राहुल गांधी का बयान ज्यादा से ज्यादा “उनका व्यक्तिगत अनुभव” हो सकता है। सेंट स्टीफेंस में शैक्षिक वातावरण की सामान्यत: ऐसा नहीं है।
जनवरी 2009 में ब्रिटेन के विदेश सचिव डेविड मिलीबैंड के साथ, उत्तर प्रदेश में उनके संसदीय निर्वाचन क्षेत्र में, अमेठी के निकट एक गाँव में, उनके द्वारा गरीब की स्थिति दशा पर संपर्क अभियान को भी विपक्ष द्वारा पर्यटन यात्रा कह कर आलोचना की गई ।
पाकिस्तान पर दी गयी सलाह और श्री प्रणब मुखर्जी तथा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ निजी मुलाकातों में राहुल के द्वारा किये गए आचरण , किसानों के हित मे भूमि अधिग्रहण अधिसूचना को फाड़ना जैसे क्रांतिकारी योग्य कार्य को भी विपक्षियों द्वारा अन्य आयाम देकर उनके व्यक्तित्व के विरुद्ध ” बड़ी कूटनीतिक भूल या गैर जिम्मेदार” बताया जाता है।
जुलाई २०१७ में भारत और चीन के बीच चल रहे डॉकलाम विवाद के बीच राहुल गांधी का चीनी राजदूत से स्वयं मिलकर भूमि विवाद समाप्त करने का प्रयास करना भी विवाद का विषय बनाया जाता है ।
तीन तलाक पर रोक की निंदा कर,
रामसेतू के विरुद्ध न्यायालय में पक्ष रख,
रामजन्मभूमि मंदिर के प्रकरण में, पहले बाबरी को न टूटने देने का बयान देना और फिर अपनी पार्टी के प्रसिद्ध वकीलों को मुस्लिम पक्ष की और से पैरवी करने देने या न रोकने पर उनकी और कांग्रेस की हिन्दू विरोधी होने की निरंतर चर्चा व
मुस्लिम परस्त होने के प्रमाण के तौर पर आलोचना हुई,
बहुसंख्यक हिन्दू विशेषकर सवर्ण, पिछड़े और दलित सभी अधिक विरोधी हो, अन्य हिन्दू वादी नेताओ को चुनने में मजबूर हुये।
कश्मीर में हुए हिंदुओ के नरसंहार, विशेषकर कश्मीरी पंडितों पर हुये नृशंस अत्याचारों के लिए, कश्मीर को नेहरू द्वारा स्वायत्तता देना दोषी माना जाता है,
वही दूसरी और धारा 370 के निरस्त्रीकरण कर कॉंग्रेस के इस त्रुटि को सुधारने पर भी, इस अच्छे कदम की आलोचना कर राहुल ने उनके और कांग्रेस पार्टी के बचे खुचे बहुसंख्यक हिंदुओ के समर्थन से भी दूर कर दिए।
अतः यह कहना अनुचित नही लगता की राहुल व सोनिया गांघी और उनकी सलाहकार मंडली में राजनीतिक समझ का नितांत अभाव बार बार प्रदर्षित है और वे बिना विपक्ष के प्रयासों के ही आसानी से सेल्फ गोल कर, स्वयं के कैरियर तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भविष्य को अप्रासंगिक कर, देश के नक्शे से उन्मूलन करने में उदधृत है।























