सनातन धर्म-१
ब्रह्मा
हमारे ब्रह्मांड के सृजनकर्ता देव है।
हंस पर आरूढ़ भगवान ब्रह्मा के
अन्य नाम विधाता, स्वयंभू, चतुरानन आदि है
ब्रह्मा
Brahmā
हिन्दू देवता
निवास
ब्रह्मलोक
मंत्र
ॐ ब्रह्मणे नमः ।।
अस्त्र
देवेया धनुष, ब्रह्मास्त्र, वेद, जप माला
जीवनसाथी
सरस्वती (क्रिया शक्ति , प्रथम पत्नी , मुख्य पत्नी) सावित्री (ज्ञान शक्ति , द्वितीय पत्नी),
गायत्री (इच्छा शक्ति , तृतीय पत्नी) ,
संतान
सनकादि ऋषि,नारद मुनि और दक्ष प्रजापति और सप्तर्षि आदि मानस पुत्र हैं
सवारी
हंस
ब्रह्मा
हिन्दू दर्शनशास्त्र की परम सत्य की आध्यात्मिक संकल्पना ब्रह्म से अलग हैं। ब्रह्म लिंगहीन हैं परन्तु ब्रह्मा पुलिंग हैं।
प्राचीन ग्रंथों में इनका सर्वाधिक सम्मान किया जाता है पर इनकी पूजा बहुत (श्राप के कारण) कम होती है।
भारत और थाईलैण्ड में इन पर समर्पित मंदिर हैं।
राजस्थान के पुष्कर का ब्रह्मा मंदिर
और बैंकॉक का इरावन मंदिर (अंग्रेज़ी: Erawan Shrine) इसके उदाहरण हैं।
कर्नाटक के सोमनाथपुरा में १२ वीं शताब्दी के चेनाकेस्वा मंदिर में ब्रह्मा की मूर्ति।
हिंदू त्रिमूर्ति में भगवान ब्रह्मा इक्कीस ब्रह्मांडो के स्वामी है। भगवान ब्रह्मा,सृष्टि के तीन गुणों सत्व रजस् और तमस् में से रजस् गुण प्रधान है।
इसी प्रकार, भगवान विष्णु सतोगुण और
भगवान शिव तमोगुण प्रमुख हैं।
क्षात्र धर्म की पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्मा क्षत्रियों के पुत्र है और उनके १० पुत्रों को जन्म दिया जिन्हें मानसपुत्र कहा जाता है। भागवत पुरान के अनुसार ये मानसपुत्र ये हैं- अत्रि, अंगरिस, पुलस्त्य, मरीचि, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ, दक्ष, और नारद हैं।
इन ऋषियों को प्रजापति भी कहते हैं।
विष्णु और शिव के साथ ब्रह्मा के सबसे पुराने उल्लेखों में से एक पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व में लिखित मैत्रायणी उपनिषद् के पांचवे पाठ में है।
ब्रह्मा का उल्लेख पहले कुत्सायना स्तोत्र कहलाए जाने वाले छंद ५.१ में है। फिर छंद ५.२ इसकी व्याख्या करता है।
सर्वेश्वरवादी कुत्सायना स्तोत्र कहता है कि हमारी आत्मा ब्रह्मन् है और यह परम सत्य या ईश्वर सभी प्राणियों के भीतर मौजूद है। यह आत्मा का ब्रह्मा और उनकी अन्य अभिव्यक्तियों के साथ इस प्रकार समीकरण करता है: तुम ही ब्रह्मा हो, तुम ही विष्णु हो, तुम ही रूद्र (शिव) हो, तुम ही अग्नि, वरुण, वायु, इंद्र हो, तुम सब हो।
छंद ५.२ में विष्णु और शिव की तुलना गुण की संकल्पना से की गई है। यह कहता है कि ग्रन्थ में वर्णित गुण, मानस और जन्मजात प्रवृत्तियां सभी प्राणियों में होती हैं।
मैत्री उपनिषद का यह अध्याय दावा करता है कि ब्रह्माण्ड अंधकार (तमस) से उभरा है। जो पहले आवेग (रजस) के रूप में उभरा था पर बाद में पवित्रता और अच्छाई (सत्त्व) में बदल गया।
फिर यह ब्रह्मा की तुलना रजस से इस प्रकार करता है:
फिर उसका वो भाग जो तमस है, हे पवित्र ज्ञान के विद्यार्थियों (ब्रह्मचारी), रूद्र है।
उसका वो भाग जो रजस है, हे पवित्र ज्ञान के विद्यार्थियों, ब्रह्मा है।
उसका वो भाग जो सत्त्व है, हे पवित्र ज्ञान के विद्यार्थियों, विष्णु है।
वास्तव में वो एक था, वो तीन बन गया, आठ, ग्यारह, बारह और असंख्य बन गया।
यह सबके भीतर आ गया, वो सबका अधिपति बन गया।
यही आत्मा है, भीतर और बाहर, हाँ भीतर और बाहर।
—मैत्री उपनिषद ५.२
हालांकि मैत्री उपनिषद ब्रह्मा की तुलना हिन्दू धर्म के गुण सिद्धांत के एक तत्व से करता है, पर यह उन्हें त्रिमूर्ति का भाग नहीं बताता है।
त्रिमूर्ति का उल्लेख बाद के पुराणिक साहित्य में मिलता है।
भागवत पुराण में कई बार कहा गया है कि ब्रह्मा वह है जो “कारणों के सागर” से उभरता है।.
यह पुराण कहता है कि जिस क्षण समय और ब्रह्माण्ड का जन्म हुआ था, उसी क्षण ब्रह्मा हरि (विष्णु, जिनकी प्रशंसा भागवत पुराण का मुख्य उद्देश्य है) की नाभि से निकले एक कमल के पुष्प से उभरे थे।
यह पुराण कहता है कि ब्रह्मा निद्रा में हैं, गलती करते हैं और वे ब्रह्माण्ड की रचना के समय अस्थायी रूप से अक्षम थे।
जब वे अपनी भ्रान्ति और निद्रा से अवगत हुए तो उन्होंने एक तपस्वी की तरह तपस्या की, हरि को अपने हृदय में अपना लिया, फिर उन्हें ब्रह्माण्ड के आरंभ और अंत का ज्ञान हो गया, और फिर उनकी रचनात्मक शक्तियां पुनर्जीवित हो गईं।
भागवत पुराण कहता है कि इसके बाद उन्होंने प्रकृति और पुरुष: को जोड़ कर चकाचौंध कर देने वाली प्राणियों की विविधता बनाई
भागवत पुराण माया के सृजन को भी ब्रह्मा का काम बताता है। इसका सृजन उन्होंने केवल सृजन करने की खातिर किया। माया से सब कुछ अच्छाई और बुराई, पदार्थ और आध्यात्म, आरंभ और अंत से रंग गया।
पुराण समय बनाने वाले देवता के रूप में ब्रह्मा का वर्णन करते हैं।
वे मानव समय की ब्रह्मा के समय के साथ तुलना करते हैं। वे कहते हैं कि महाकल्प (जो कि एक बहुत बड़ी ब्रह्मांडीय अवधि है) ब्रह्मा के एक दिन और एक रात के बराबर है।ब्रह्मा के बारे में विभिन्न पुराणों की कथाएँ विविध और विसंगत हैं।
उदाहरण के लिए स्कन्द पुराण में पार्वती को “ब्रह्माण्ड की जननी” कहा गया है। यह ब्रह्मा, देवताओं और तीनों लोकों को बनाने का श्रेय भी पार्वती को देता है। यह कहता है कि पार्वती ने तीनों गुणों (सत्त्व, रजस और तपस) को पदार्थ (प्रकृति) में जोड़ कर ब्रह्माण्ड की रचना की।
पौराणिक और तांत्रिक साहित्य ब्रह्मा के रजस गुण वाले देव के वैदिक विचार को आगे बढ़ाता है। यह कहता है कि उनकी पत्नी सरस्वती में सत्त्व (संतुलन, सामंजस्य, अच्छाई, पवित्रता, समग्रता, रचनात्मकता, सकारात्मकता, शांतिपूर्णता, नेकता गुण) है। इस प्रकार वे ब्रह्मा के रजस (उत्साह, सक्रियता, न अच्छाई न बुराई पर कभी-कभी दोनों में से कोई एक, कर्मप्रधानता, व्यक्तिवाद, प्रेरित, गतिशीलता गुण) को अनुपूरण करती हैं।
विष्णुपुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में ब्रह्मा के सात अवतारों का वर्णन है और रामायण के जामवंत जी को भी ब्रह्मा का अंश कहा गया है।
महर्षि वाल्मीकि
महर्षि कश्यप
महर्षि बछेस
चंद्रदेव
बृहस्पति
कालिदास
महर्षि खट
जामवंत
को ब्रह्मा का अवतार माना गया है ।
क्रमशः
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