मंथन. सांप्रदायिक हिंसा विरोध विधेयक अभी चर्चा में हे का मूलतः मकसद देश में बड़ते हुए सांप्रदायिक उपद्रवों व हिंसा को कठोरता से रोकने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों और उनके अधिकारियों को निष्पक्ष तथा हिंसा रोकने के लिए जिम्मेदार बनाना है. इसमें हिंसा वाले राज्य के मुकदमे दूसरे राज्य में ट्रांसफर करने और गवाहों की सुरक्षा के लिए कदम उठाने का भी प्रस्ताव है.
प्रस्तावित विधेयक के मुताबिक धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को निशाना बनाकर की गई हिंसा को रोकने और नियंत्रित करने के लिए निष्पक्ष और भेदभावरहित ढंग से अधिकारों का इस्तेमाल करना केंद्र, राज्य सरकारों और उनके अधिकारियों की ड्यूटी का अनिवार्य हिस्सा होगा.
विधेयक के विपक्ष में कहना हे की इसमें प्रत्येक सांप्रदायिक हिंसा के लिए बहुसंख्यक समुदाय को ही दोषी मानने का प्रावधान हे जबकि अभी तक देश की सांप्रदायिक हिंसा उपद्रवों का इतिहास इस बात का साक्षी हे की हमेशा से दोनों ही समुदायों के कट्टरवादी आपराधिक तत्वों का बराबर का दोष इन हिंसात्मक गतिविधियों में रहा हे, अतः किसी एक स्थान पर अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक होना सांप्रदायिक हिंसा के लिए स्वचालित रूप से दोष निर्धारित करने का कारण नहीं हो सकता.
विधेयक के आपत्तिजनक प्रावधानों को देखते हुए इसमें आमूलचूल सुधार परिष्कार की अत्यंत आवश्यकता से कोई इनकार नहीं कर सकता , शायद इसीलिए कई कानूनी विशेषज्ञ और पीएम भी इस पर सभी सम्बंधितो की सहमती से ही सुधार कर इस कानून की वकालत स्पस्ट कर चुके हे और ये सभी राज्यों को विचार विमर्श के लिए भेजा गया हे , संसद में भी इस पर बृहद गंभीर चर्चा जरूरी हे ,फिर भी इसे विवाद में लाना शायद राजनीतिज्ञों के सियासी गुणाभाग लाभ हित के लिए अनिवार्य हो.






















