नई दिल्ली । कश्मीर और कश्मीरियों के विकास में अनुच्छेद 370 की उपयोगिता पर मोदी की अपील ने चर्चा गर्म कर दी है कि क्या भाजपा ने सत्ता के लिए 370 छोड़ी । भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की ओर से छेड़ी गई इस बहस सरे दलों ने जहां सिरे से खारिज कर दिया है।
उग्र हिंदुत्ववादी के रूप में मोदी का रुख जम्मू-कश्मीर को लेकर बदला-बदला सा है। जम्मू में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 370 पर बहस शुरू करने की बात कही है। बीजेपी की मूल प्रतिज्ञाओं में शामिल तीन बुनियादी बातें उसे देश की बाकी सभी पार्टियों से अलग करती थी। अनुच्छेद 370 का खात्मा, पूरे देश में समान नागरिक संहिता (कॉमन सिविल कोड) लागू करना यानी मुस्लिम पर्सनल लॉ का खात्मा, और अयोध्या में (विवादित स्थल पर) राम मंदिर का निर्माण।
बीजेपी एनडीए के मुख्य घटक दल के रूप में लगभग छह साल तक केंद्र सरकार चलाने का मौका मिला, लेकिन उस पूरी अवधि में उसके किसी भी नेता ने इन तीनों बिंदुओं का जिक्र तक नहीं किया। हां, जब भी आम चुनाव नजदीक आते हैं, वे किसी न किसी बहाने इन पर चर्चा जरूर शुरू कर देते हैं, ताकि अपने हार्डकोर समर्थकों को सक्रिय कर सकें और यदि संभव हो तो उनके इर्दगिर्द चुनावी गोलबंदी को भी आकार दे सकें। लेकिन इन तीनों बिंदुओं को वे अभी तक अपनी तरफ से परम सत्य बताते आए हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि यूपीए सरकार की गड़बड़ियों का फायदा अभी के चुनावी माहौल में बीजेपी को मिल रहा है। लेकिन इस पार्टी के नेताओं को कई राज्यों में दिखे अपने माफिक माहौल का यह अर्थ हरगिज नहीं लगाना चाहिए कि लोग बीजेपी को एक भरोसेमंद पार्टी मानने लगे हैं। मौका ताड़ कर किसी भी मुद्दे पर रंग बदल लेने वाली राजनीतिक पार्टी की छवि बीते वर्षों में बीजेपी की बनी है वह मोदी के बयांन से और पुष्ट हो गई हे। वे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का दावा करते हैं, लेकिन जरा भी फायदे की गुंजाइश पाकर भ्रष्ट से भ्रष्ट व्यक्ति की कतार में शामिल हो जाते रहे हे, -चाहे वे कर्नाटक के माइनिंग माफिया रेड्डी बंधु हों या एनआरएचएम घोटाले में जेल गए बाबू सिंह कुशवाहा और भी अनेक उदाहरण इसके मिलते रहे हे.





















