पाकिस्तान आंतकवादी चरमपंथियों की पनाहगाह ,अत्याधुनिक अमेरिकी निगरानी पर मुंबई हमलों से पहले भी चरमपंथी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का ज़िक्र भारत में होने वाली कई आतंकवादी गतिविधियों के सिलसिले में लिया जाता था, लेकिन 26/11 के बाद पूरी दुनिया का ध्यान इसकी तरफ़ गया.दिसंबर 2008 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने लश्कर-ए-तैयबा को ‘आतंकवादी संगठन’ घोषित कर इस पर प्रतिबंधों का ऐलान किया.इस आतंकवादी संगठन के बढ़ते ख़तरे और पाकिस्तानी समाज और शासन तंत्र में उसकी गहरी पैठ लश्कर-ए-तैयबा कोई स्वतंत्र संगठन नहीं है. यह जमात-उद-दावा की सैन्य शाखा है. इसका मक़सद भारत में या भारत प्रशासित कश्मीर में जिहाद करना है. इसकी अपनी कई शाखाएं हैं जो अन्य मुल्कों में काम करती हैं.
पिछले चार साल में आतंकवादी संगठन जमात-उद-दावा और लश्कर-ए-तैयबा पाकिस्तान में बहुत ताक़तवर हो गए हैं.2007 तक तो जमात-उद-दावा पाकिस्तान में धार्मिक और राजनीतिक ताकत बन चुकी थी, लेकिन बीते तीन साल में जमात-उद-दावा अन्य धार्मिक संगठनों का नेतृत्व कर रही है. अगर आप यूट्यूब पर देखें, तो जमात-उद-दावा खौफ़नाक तरीक़े से राजनीतिक ताकत बन चुकी है.
पाकिस्तान ने शुरू से एक नीति अपनाई थी कि अपनी सुरक्षा को वह जिहाद से मज़बूत बनाएगा. इसे पाकिस्तान ने अब तक जारी रखा हुआ है. न सिर्फ भारत बल्कि उसने अफ़ग़ानिस्तान के सिलसिले में भी यही नीति अपनाई थी.इसकी वजह से पाकिस्तान में सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में यह नीति समा गई है. अगर आप पाकिस्तानी टीवी देखें, तो आतंकवादी हाफ़िज़ सईद को मीडिया और टीवी एंकर धार्मिक नेता के बतौर पेश करते हैं जमात-उद-दावा को लेकर समाज में बहुत ज़्यादा सहानुभूति है.
पाकिस्तान के पहले चुने हुए प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान ने भारत में जिहाद शुरू किया था, न कि किसी फ़ौजी अधिकारी ने
रब्बानी, मुल्ला जमीलुर्रहमान और अमहद शाह मसूद को पाकिस्तान लाए और उन्हें ट्रेनिंग दी गई.कुल मिलाकर लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकारों के बीच भी आतंकीयो से सहानुभूति है.पाकिस्तानी सेना का वहां के समाज पर इतना असर है.
पिछले तीन साल में तो यह देखा गया है कि पाकिस्तान की अदालतों, ख़ासतौर पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट, उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि जैसे जमात-उद-दावा के लोग उनमें बैठे हुए हैं.कुछ ख़ास इलाक़ों में सेना जमात-उद-दावा या लश्कर के सदस्य भर्ती करती है ये गहरा संबंध हैं. सेना और जिहादियों का सीधा संबंध है.बुनियादी तौर पर भारत को लेकर दोनों एक लक्ष्य को लेकर काम कर रहे हैं, आतंकवादी विचारधारा के तौर पर पूरी दुनिया को काबू करना चाहते हैं.
कोई भी सरकार सेना और जिहादियों के बीच रिश्ते खत्म करने की कोशिश भी नहीं करती क्योंकि उसकी सेना और आईएसआई के सामने कोई औकात ही नहीं हे.राष्ट्रपति ज़रदारी सेना आईएसआई और आतंकवादियो के अपवित्र गठजोड़ की इच्छा के विपरीत जाने की सोचकर ही बुरे हश्र को प्राप्त किये हे .
लश्कर-ए-तैयबा स्थापना से जुड़े जो दस्तावेज हैं, वो बताते हैं कि अमेरिका और पश्चिम देश भी उनके टार्गेट पर हमेशा से हे और वे दुनिया में हर जगह आतंकवादी जेहाद करना चाहते हैं, इसलिए अमेरिकी प्रशासन दुनिया की स्थिरता और शांति हेतू लगातार भारत को पल पल की निगरानी और रोकथाम में सहयोग देता हे.






















