सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि नौकरशाह अपने राजनीतिक आकाओं के लिखित आदेश को ही मानें. इसके साथ ही अदालत ने नौकरशाहों के कार्यकाल को तय करने का फ़ैसला भी दिया है
उच्चतम न्यायालय ने आज एक अहम फैसले में निर्देश दिया कि नौकरशाहों के लिये न्यूनतम कार्यकाल सुनिश्चित किया जाये और इनकी पदोन्नति तथा स्थानांतरण के बारे में एक बोर्ड निर्णय करे। न्यायालय ने नौकरशाही को राजनीतिक आकाओं के चंगुल से मुक्त करने और सरकार के इशारे पर नहीं चलने वाले प्रशासनिक अधिकारियों के तबादले की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिये महत्वपूर्ण निर्देश दिये हैं।
राजनीतिक दबाव के कारण प्रशासनिक अधिकारियों की सत्यनिष्ठा के मानक और जवाबदेही में आ रही गिरावट पर चिंता व्यक्त करते हुये न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति पी सी घोष की खंडपीठ ने कहा कि नौकरशाहों को अपने वरिष्ठ अधिकारियों तथा राजनीतिक आकाओं के मौखिक आदेशों पर कार्रवाई नहीं करनी चाहिए। न्यायालय ने कहा कि इससे ‘पक्षपात और भ्रष्टाचार’ की गुंजाइश बढ़ती है और यह सूचना के अधिकार कानून के तहत नागरिकों को प्रदत्त अधिकारों को भी निष्फल बनाता है।
नौकरशाही के कामकाज में व्यापक सुधार करने के सुझाव देते हुये न्यायाधीशों ने केन्द्र, राज्य सरकारों और केन्द्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि तीन महीने के भीतर प्रशासनिक अधिकारियों के लिये न्यूनतम कार्यकाल का प्रावधान करने के बारे में उचित निर्देश जारी किये जायें। न्यायालय ने कहा कि अधिकारियों का बार बार तबादला सुशासन के खिलाफ है और इसलिए उनका न्यूनतम कार्यकाल निर्धारित किया जाये ताकि वे सार्वजनिक नीतियों को पेशेवर और अधिक प्रभावी तरीके से लागू कर सकें।
न्यायाधीशों ने 47 पेज के फैसले में कहा, ‘‘बार बार अधिकारियों का तबादला सुशासन के लिये हानिकारक है। न्यूनतम कार्यकाल से प्रभावी तरीके से सेवा सुनिश्चित करने के साथ ही कार्यक्षमता भी बढ़ेगी। वे समाज के गरीब तथा सीमांत वर्गो के लिये किये जा रहे तमाम सामाकि और आर्थिक उपायों को लागू करने की प्राथमिकता निर्धारित कर सकते हैं।





















