उच्च सवेधानिक परम्परा के संवाहक राष्ट्रपति प्रणब मुख़र्जी ने एक बार फिर सिद्ध किया छोटी सोच को छोड़ सच्चे मन से देश हित की बात करने वाले बिरले ही हे.
हमारे देश और राज्यों में जरूरी विधिक कार्यो को जेसे तेसे निपटने या यू कहिये खानापूर्ति करने के लिए छोटे छोटे सत्र बुलाये जाते हे जिसमे देश हित में मंथन होने कि बजाये राजनीतिक हिसाब किताब निपटाने के लिए सभी दलो द्वारा भरपूर हंगामा कर ध्यान आकृष्ट करना एक जरूरी रस्म रिवाज हो गया हे.
प्रणव ने सरकार की वित्तीय योजनाओं पर व्यापक संवाद के लिए संसद और राज्य विधानसभाओं के सत्र लम्बी अवधि के होने की आवश्यकता तो बताई पर इसमें क्या कोई अमल करेगा इसकी संभावना निराशाजनक क्षीण हे .





















