अमर शहीद राजाभाऊ महाकाल का मूल नाम नारायण राव था। 26, जनवरी, 1926 को उज्जैन में जन्में नारायण राव ने चौथी कक्षा तक ही औपचारिक शिक्षा प्राप्त की। बचपन से ही आप राष्ट्रीय विचारों और स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक होने के कारण देश भक्ति पूर्ण गतिविधियो से जुड़ गये.
नारायण राव को जंगे आजादी के अमर शहीद बलिदानियो क्रांतिकारियों की गौरव गाथा अंतर्मन से प्रभावित करती रही. वे उज्जैन में बाल्यकाल से ही खेलकूद और शारीरिक सोष्ठव गतिविधिओ में सम्मिलित होते और अन्य बच्चों किशोरो को भी प्रेरित कर उनका अनौपचारिक समूह बनाते.
वे अपने स्तर पर स्वतंत्रता के लिए जो भी बन पड़ता आयोजन करते, महाकाल के परम् भक्त होने से मित्रों में राजा भाऊ फिर महाकाल के नाम से जाने जाने लगे.
नारायण राव राजा भाऊ महाकाल बाल्यकाल में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक श्री दिगंबर राव तिजारे के संपर्क में आये , और यही से उनके जीवन को मातृ भूमि को मुक्त कराने की प्रेरणा में प्रखरता और दृढ़ता आयी.
आपके कारण संघ की विचारधारा गतिविधियों की और अन्य किशोर युवाओं में भी आकर्षण बढ़ने लगा.
आगे चलकर आप पूर्णकालिक स्वयं सेवक बने और सोनकच्छ क्षेत्र में पदस्थ हुए। जीवन निर्वाह हेतु अपने सोनकच्छ में एक छोटा भोजनालय खोल लिया ओर इससे भी वे पारमार्थिक कर संगठन विस्तार मे जुटे रहे.
1955 में जब गोवा मुक्ति आन्दोलन प्रारंभ हुआ और पहला जत्था इन्दौर से गोवा जाकर लौट आया तो नारायणराव राजाभाऊ महाकाल ने द्वितीय जत्थे के नेतृत्व का संकल्प लिया। इस जत्थे में अधिकांशतः माँ भारती के प्रबल समर्थक स्वयं सेवक थे। इस जत्थे में संघ वय की दृष्टि से हरिभाऊ वाकणकर को जत्थे का नेतृत्व करना था, परन्तु राजाभाऊ की जिद् के आगे उन्हें नेतृत्व प्रदान किया गया ।
गोवा जाने के पूर्व राजाभाऊ अपनी रिस्ट वाच के बदले अपने एक मित्र से 30 रुपये नकद लेकर गये थे। 15, अगस्त, 1955 को मध्य भारत के इस जत्थे ने ‘‘आया है महाकाल, भागेगा पुर्तगाल’’ जयघोष के साथ बेलगांव के समीप वांदा चौकी में प्रवेश किया वैसे ही पुर्तगाली सैनिकों ने गोली चालन कर राजाभाऊ महाकाल को रोकना चाहा पर उन्होंने शरीर में धंसी गोली को कंकड़ पत्थर के मानिंद मानते हुए, अपने हाथो में देश का गौरव तिरंगा थामे रखा.
लगातार दूसरी गोली लगने से वे गिरने को हुए किंतु उन्होंने राष्ट्र ध्वज को नीचे नहीं गिरने दिया.
प्राण त्याग शहीद होने से पूर्व राजा भाऊ ने ध्वज की पवित्रता की रक्षा करते हुए अन्य साथी को ध्वज सौपा.
अमर शहीद नारायणराव राजाभाऊ महाकाल के नेतृत्व में मालवा क्षेत्र के तीन अन्य क्रांतिकारियो कल्यााणमल शर्मा, बापूलाल सौधिया तथा गंगा विष्णु भरथरे ने मौके पर ही संघर्ष कर बलिदान दिया।
जत्था चारों शहीदों के अस्थिकलश लेकर इन्दौर लौट आया। जहां देश वासीओ ने आपको कृतज्ञ हो श्रद्धांजलि दी.
शहीद राजाभाऊ महाकाल की पुण्य स्मृति में मालवा अंचल में अनेकों स्थल आपके नाम पर अर्पित किए गये.
सोनकच्छ में कालीसिंध के किनारे स्थित शमशान में एक चबूतरे का निर्माण कराया गया है। आपकी स्मृति को अमर बनाने के लिये उज्जैन मुख्य बस स्टैण्ड का नामकरण ‘‘राजाभाऊ महाकाल’’ के नाम पर किया गया।
अमर शहीद श्री राजाभाऊ महाकाल की जन्म शताब्दी समारोह का आयोजन कर राष्ट्र के नव निर्माण में जुटी पीढ़ी को उनके जीवन से प्रेरणा लेते और देते रहने की आवश्यकता है।
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चंद्रशेखर वशिष्ठ























