ऋणमुक्ति, वोट का ईनाम नहीं, हक़ है:: कमलेश पारे Dec 24, 2018.
यदि आप सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं,चाव से टीवी की ख़बरें देखते रहते हैं या ‘दिल लगाकर’अखबार ही पढ़ते हैं,तो किसानों की ऋण मुक्ति पर अपनी एक निश्चित राय बना चुके होंगे.वह भी यह कि यदि ऐसा है,तो हमारा घर,कार,टीवी,फ्रिज,व्यापार या अन्य छोटे मोटे कामों के लिए लिया गया क़र्ज़ भी माफ़ हो जाय तो कितना अच्छा हो.
कुछ लोग इससे देश की आर्थिक प्रगति में बाधा भी देख रहे हैं,और कुछ आदतन इसमें राजनैतिक लाभ हानि देख रहे हैं.निगाह आपकी है,समझ भी आपकी ही,और अपनी अभिव्यक्ति के लिए आप स्वतंत्र भी तो हैं.
मेरा निवेदन सिर्फ इतना है कि क्या आप उसे नज़दीक से जानते हैं,जिसका क़र्ज़ माफ़ हो रहा है ? क्या आप उसके काम और उन परिस्थितियों को जानते हैं,जिसमें वह जी रहा है,या कर्ज में रह-रहकर आत्महत्याएं कर रहा है,और अपनी कई-कई पीढ़ियों की आजीविका खेती छोड़ने की बात भी सोच रहा है.क्या आप उसे उसकी मेहनत के बदले मिल रहे दामों के बारे में जानते हैं ? यदि नहीं,तो जान लें कि वह जिस असुरक्षा में फटेहाल जी रहा है,वह हमारी आजादी पर कलंक है.
हर पढ़े लिखे व्यक्ति को प्रयास करने से,आसानी से यह जानकारी मिल सकती है कि बरसों से कृषि उत्पादनों को बाज़ार में बेचने के किसानों को क्या भाव मिले,उसकी कितनी लागत आई या आती है,और आपको वे ही चीज़ें किन भावों में मिली? आंकड़ों के बीहड़ में घुसने से,आपको ही सब मिल जाएगा.
किसान,भारत में कहीं का हो.मध्यप्रदेश,राजस्थान,छत्तीसगढ़,पंजाब,हरियाणा या असम का,उसके उत्पादन की लागत न कभी ठीक से आंकी जाती है,और न उसे मिलती.शहरी क्षेत्र का,किसी भी चीज़ का उत्पादक बिजली से लेकर घर-भाड़े या अपनी जगह और मजदूरी तक जोड़कर उसका दाम तय करता है,जबकि किसान के लिए केंद्र सरकार ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’निर्धारित करती है.ऊपर से लगभग सौ प्रतिशत मौकों पर पूरे देश में यह भी किसान को नहीं मिलता.
भले सामान्य ज्ञान के लिए सही,खेती में किसान की जमीन का उसके मूल्य अनुसार भाड़ा,उसके पूरे परिवार की मजदूरी (क्योंकि उसके परिवार का हर सदस्य,यहाँ तक कि गाय बैल भी अपना योगदान देते हैं),बिजली,डीज़ल,बीज,खाद,दवाइयां(खेती की और परिवार सहित उसकी खुद की) आदि इत्यादि जोड़ तो लें.फिर इसकी न्यूनतम समर्थन मूल्य से तुलना कर लें.मौसम की अनिश्चितता या उससे होने वाली असुरक्षा भी जोड़ लेंगे तो बड़ी कृपा होगी.
यह स्थिति आज की नहीं है,सालों साल से चली आ रही है.अब किसान भी इस सबसे आज़िज़ आ गया है,और कुल के पौन हिस्सा किसान इस आजीविका को छोड़ना चाहते हैं.यदि ऐसा हो गया,तो अपन सब क्या खाएंगे ? क्योंकि,आप भले चाँद पर चले जाइये,खाना तो रोटी ही है.
कल परसों मध्यप्रदेश में घोषित हुई ऋण मुक्ति से राज्य के कोष पर 35 से 38 हज़ार करोड़ का भार आएगा.छत्तीसगढ़ में 6100 करोड़ रुपये लगेंगे और राजस्थान में 18000 करोड़ चाहिए होंगे.यानी कुल लगभग 60 000 करोड़.जबकि भारत के निजी क्षेत्र के स्टील उद्योग पर ही बरसों बरस से डेढ़ लाख करोड़ रुपया बैंकों का बकाया है.प्लीज,राजनीति बीच में मत लाइयेगा,व्यापारी मोदी,मालया और मेहुल सहित 29 लोगों से ही 40000 करोड़ रुपये लेने हैं.
बिज़नेस स्टैण्डर्ड अखबार ने मार्च 18 में ही उद्योगों में फंसे डेढ़ लाख करोड़ रुपये (एक आंकड़े में यह चार लाख करोड़ भी है) पर प्रधानमन्त्री कार्यालय और वित्तमंत्रालय के किसी कार्यदल की खबर छापी थी कि इसे कोई नया सम्मानित नाम देकर रफा-दफा कर दिया जाय.
इस मामले में किसी एक बड़े आर्थिक जानकार ने यह भी कहा था कि यह तो आर्थिक गति-प्रगति के लिए जरूरी है.जब यह जरूरी है,तो किसानों के साठ हज़ार करोड़ भी जायज होना चाहिए,क्योंकि वे भी तो इसी देश का नागरिक हैं.
पूर्व प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह से आप और मैं सहमत हैं कि “पैसे पेड़ पर नहीं लगते”.श्री राहुल गांधी ने तो बोला भी है कि ऋण मुक्ति किसानों की समस्या का ‘स्थाई हल’नहीं है.किसान भी तो बरसों से यही बोलता आ रहा है कि “हम भी भीख नहीं मांगते,हमें हमारी उपज का वाजिब दाम दिलाना ही स्थाई हल है.”
जैसे इस देश में संविधान प्रदत्त ‘जीने के अधिकार’ के तहत अन्न-सुरक्षा,’शिक्षा का अधिकार’,निजी-सुरक्षा या स्वास्थ्य के अधिकार हैं वैसे ही आजादी के साथ जीने के लिए किसान को भी वाजिब ‘दाम-सुरक्षा’का संवैधानिक हक़ क्यों नहीं है ?आप उसे वह दे दीजिये,वह कभी आपसे क़र्ज़-माफ़ी की बात ही नहीं करेगा.
श्री राहुल गांधी या देश के सभी राजनेता वाक़ई ही यदि किसानों को लेकर गंभीर हैं,उनकी समस्या का ‘स्थाई-हल’चाहते हैं,तो पूरे के पूरे तंत्र में सुधार की बात क्यों नहीं करते ? उसे सुनिश्चित करने के लक्ष्य क्यों नहीं बनाते ?
ऐसा नहीं है कि ये सब लोग जानते नहीं हैं कि किसान से उसकी उपज किस भाव खरीदी जाती है,और उपभोक्ता तक वह किस भाव पहुँचती है.वे यह भी जानते हैं कि बीच में कौन और कितना कमाता है.स्थाई हल चाहिए,तो इस लूट को रोकने की तजवीज ही कर दीजिये.
भले किसानों को अभी भरोसा नहीं है,पर मार-ठोककर,कृषि उपज मंडियों के मार्फ़त यह ‘तंत्र’ठीक हो सकता है.अभी पूरे देश में कुल 7600 मंडियां हैं,जबकि नियमानुसार 5 कि.मी.की परिधि में एक,की जरूरत के मान से 42500 मंडियां चाहिए.सरकार से पूछो तो कहती है कि पैसे नहीं हैं.आप मंडियां बनाइये तो सही,शायद नियम-क़ानून के दायरे में आकर चीज़ें सुधार की ओर कुछ तो बढ़ें.
कृषि विशेषज्ञ और देश में अपनी तरह के अकेले विश्लेषक डॉ.देविंदर शर्मा ने बताया है कि उच्च-शक्ति प्राप्त संसदीय समिति,जिसके अध्यक्ष श्री शांताकुमार रहे,ने कहा था कि देश के मात्र 6 प्रतिशत किसानों को ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ मिलता है.यानी 94 प्रतिशत किसान व्यापारियों,बिचौलियों और दलालों के भरोसे हैं.ऊपर से कुछ एयरकंडीशन में बैठने वाले विशेषज्ञ यह भी कहने लगे हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य ही ख़तम कर दें,ताकि प्रतियोगिता बढे.अब आप ही बताएं,कि अभी जब 94 प्रतिशत किसानों को समर्थन मूल्य नहीं मिल रहा है,तब लूट की हालत यह है,तो इसके ख़तम होने पर क्या होगा ?
हाँ मोदीजी,हाँ राहुलजी,ऋण मुक्ति राजनीति का विषय नहीं है,यह तात्कालिक राहत ही है.यदि व्यवस्था पर बात नहीं हुई,या इसमें सुधार नहीं हुआ,तो आप तो चुनाव जीतते हारते रहेंगे, देश का किसान और किसानी बर्बाद हो जाएंगे.देश मानसिक रूप से ऐसे ही शहरी और देहाती में बंटता रहेगा.
ऋणमुक्ति से अर्थव्यवस्था को लेकर डर रहे लोग जान लें,कि देखते-देखते साढ़े चार लाख करोड़ रुपये डूबत खाते में चले गए,तो इन तीस-चालीस हज़ार करोड़ से भी कुछ नहीं होगा.
और हाँ,सवाल उठता है कि पहले से क़र्ज़ में डूबी राज्य सरकारें यह पैसा कहाँ से लाएं ? तो एक बात बताएं,कि जिन जिन भी बड़ी कंपनियों के बड़े दफ्तर जिन जिन राज्यों में हैं,उनके डूबे क़र्ज़,क्या उन राज्यों की सरकारें देती हैं ? आदर्श स्थिति में यह व्यय ‘नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एन्ड रूरल डेवलपमेंट'(नाबार्ड) को उठाना चाहिए.
बात नियम,क़ानून और व्यवस्था लागू करने की करें.लक्ष्य भी यह बनाएं कि किसान ही अपने कामों से इतना कमा ले कि क़र्ज़-माफी की बात ही न उठे.
कमलेश पारे
साठ और सत्तर के दशकों में अविभाजित मध्यप्रदेश के इंदौर और रायपुर शहरों में पत्रकारिता में सक्रिय रहे कमलेश पारे ने अगले दो दशक विभिन्न शासकीय उपक्रमों में जनसम्पर्क और प्रबंध के वरिष्ठ पदों पर काम किया.अगले लगभग पांच वर्ष वे समाचार पत्र प्रबंधन में शीर्ष पदों पर रहे.मध्यप्रदेश मूल के दो समाचार पत्र समूहों के राजस्थान और मुंबई संस्करणों में महाप्रबंधक व राज्य-प्रमुख की हैसियत से काम किया.
इंदौर नगर पालिक निगम में नवाचारी परियोजनाओं सहित विभिन वैश्विक संगठनों की सहायता से नगरीय प्रबंध में लगे लोगों व जनप्रतिनिधियों के क्षमता-विकास और जन-सहयोग से विकास सुनिश्चित करने हेतु विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में भी कमलेश पारे ने अपनी सेवाएं दी हैं.इसी दौरान नगरीय विकास और प्रबंध पर केंद्रित मासिक पत्रिका ‘नागरिक’का संपादन किया.सम्प्रति स्वतंत्र लेखन …























