देश की केबिनेट को ही नही होती नीतिगत या फिर कोई भी महत्वपूर्ण फैसलो की जानकारी, वरिष्ठ मंत्रियो का कार्य जो निर्णय लिए गए है का प्रचार प्रसार कर उन्हें जनमानस के हितों के अनुरूप होना प्रतिपादित करना है, इसमे असफल रहने पर हटने के लिए बाध्य होना होता है
देश भर के समाचार संस्थानों के दफ्तरों में 8 नवंबर 2016 की शाम को अचानक अफरा-तफरी का माहौल बन गया था। हर कोई यह कह रहा था कि प्रधानमंत्री उस शाम कोई बड़ी घोषणा करने जा रहे हैं। लेकिन किसी को भी यह पता नहीं था कि वह घोषणा क्या होगी? यहां तक कि सरकार के भीतर अहम पदों पर बैठे लोगों को भी इस बारे में कोई अंदाजा नहीं था। वे भी केवल अटकलें ही लगा रहे थे।
बहरहाल उस शाम प्रधानमंत्री मोदी ने जो घोषणा की उसने इतिहास में पुराने नोटों को बंद करने के सबसे बड़े अभियान की नींव रखी। लेकिन जब पता चला कि इतने महत्त्वपूर्ण फैसले के बारे में सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों तक को कोई जानकारी नहीं थी, तो उससे इस सरकार के बारे में एक गोपनीय रहस्य उजागर हो गया। वह रहस्य मोदी सरकार के प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के ताकतवर होने से जुड़ा हुआ है। नोटबंदी ने साबित कर दिया कि प्रधानमंत्री मोदी और उनके 397 सदस्यीय पीएमओ में ही सारी सत्ता केंद्रित हो चुकी है। यहां तक कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक नेता यह कहने को मजबूर हो गए कि इस सरकार में केवल एक कार्यालय है और वह पीएमओ है।
आर्थिक नीतियां तय करने से लेकर प्रशासनिक सुधारों को अमलीजामा पहनाने तक, स्वच्छ भारत और मेक इन इंडिया अभियानों के उद्घाटन और उनकी निगरानी तक, सरकार के भीतर अहम पदों पर नियुक्ति संबंधी दिशानिर्देश देने से लेकर उद्योग एवं कारोबार जगत की समस्याओं के निराकरण के उपाय तक, स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री के भाषण में शामिल किए जाने वाले बिंदुओं को तय करने से लेकर बड़े सरकारी आयोजनों की तैयारी तक, समूची गतिविधियों के केंद्र में पीएमओ ही नजर आता है।
वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का क्रियान्वयन भी इसका अपवाद नहीं है। भारत के इतिहास का सबसे बड़ा कर सुधार बताए जा रहे जीएसटी को जब 1 जुलाई 2017 से आगाज करने की घोषणा हुई थी तो बहुतों को यह लग रहा था कि सरकार ने इसके लिए बहुत कम समय तय किया है। जीएसटी के लिए कारोबार जगत को तैयार होने का वक्त देने की मांग की गई थी लेकिन सरकार ने उसे अनसुना कर दिया था। दरअसल साउथ ब्लॉक में स्थित पीएमओ से एक संदेश बहुत साफ था कि कारोबार जगत को हर हाल में इसके लिए तैयार होना ही होगा। वैसे जीएसटी रिटर्न जमा करने में तकनीकी दिक्कतों के कई मामले सामने आने के बाद सरकार को एक समीक्षा समिति बनानी पड़ी है।
पीएमओ में कार्यरत स्टाफ भी काफी शक्तिशाली हो चुका है। पीएमओ के शीर्ष पर सेवानिवृत्त नौकरशाह नृपेंद्र मिश्रा हैं जो प्रधानमंत्री मोदी के प्रमुख सचिव की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। उनकी नियुक्ति को संभव बनाने के लिए मोदी सरकार को आनन-फानन में एक अध्यादेश तक लाना पड़ा था। असल में मिश्रा दूरसंचार नियामक ट्राई के प्रमुख रह चुके हैं लिहाजा उन पर केंद्र या राज्य सरकार में कोई अन्य पद लेने पर कानूनी रोक लगी हुई थी। लेकिन अध्यादेश लाकर इस प्रावधान में बदलाव किया गया।
पीएमओ में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की भी महत्त्वपूर्ण स्थिति है। खुफिया ब्यूरो के पूर्व प्रमुख डोभाल को मोदी के पीएमओ में काफी ताकतवर माना जाता है। इसके अलावा अतिरिक्त प्रमुख सचिव पी के मिश्रा, सचिव भास्कर खुल्बे, दो अतिरिक्त सचिव तरुण बजाज और ए के शर्मा तथा पांच संयुक्त सचिव अनुराग जैन, देबश्री मुखर्जी, वी शेषाद्रि, ब्रजेंद्र नवनीत और गोपाल बागले भी पीएमओ का हिस्सा हैं।
पी के मिश्रा इससे पहले गुजरात में भी मोदी के साथ काम कर चुके थे। उन्होंने मोदी के मुख्यमंत्री रहने के दौरान गुजरात सरकार के सभी अहम फैसलों में भूमिका निभाई थी। पश्चिम बंगाल कैडर के आईएएस अधिकारी खुल्बे का नाम पिछले साल तब चर्चा में आया था जब पीएमओ ने अपने अधिकारियों के वेतन की जानकारी सार्वजनिक की थी। खुलबे 2.01 लाख रुपये प्रति माह का वेतन पाने के साथ सर्वाधिक आय वाले पीएमओ अफसर बने थे। हरियाणा कैडर के अधिकारी बजाज को पीएमओ में आर्थिक मामलों के विभाग से लाया गया था और वह आधार परियोजना समेत कई योजनाओं की निगरानी करते हैं। गुजरात कैडर के अधिकारी शर्मा को मोदी के मुख्यमंत्री रहते समय ‘वाइब्रेंट गुजरात’ के सफल आयोजन का श्रेय दिया जाता है। मोदी के प्रधानमंत्री रहते समय शर्मा अब उद्योग जगत से संबंधित मामले देखते हैं।
मोदी के इस सर्वशक्तिशाली पीएमओ की नीति-निर्माण की बेहद गोपनीय एवं अत्यधिक केंद्रीकृत शैली मनमोहन सिंह सरकार के समय के पीएमओ से एकदम जुदा है। यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी के समय की भाजपा सरकार के समय भी पीएमओ का स्वरूप इतना केंद्रीकृत नहीं था। वर्ष 2009 से 2011 के बीच वित्त सचिव रहे अशोक चावला कहते हैं कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के समय नीतिगत फैसले मंत्रिमंडलीय समितियों, मंत्रियों के समूह और मंत्रियों के अधिकार-प्राप्त समूहों के द्वारा होते थे। चावला कहते हैं, ‘फैसले लेने की वह व्यवस्था अब बदल चुकी है।’
संप्रग सरकार में वर्ष 2007 से 2011 के दौरान कैबिनेट सचिव रहे के एम चंद्रशेखर कहते हैं, ‘मनमोहन सिंह सहमति के आधार पर फैसले लेने में यकीन रखते थे। उनसे पहले वाजपेयी भी फैसले लेने में काफी विकेंद्रित सोच रखते थे। उस समय मैंने जिन मंत्रियों को भी रिपोर्ट किया, वे फैसले लेने में आजाद महसूस करते थे।’ सत्ता केंद्र के तौर पर पीएमओ का आविर्भाव समय के साथ हुआ है। वाजपेयी सरकार में वित्त एवं विदेश मंत्री रहे यशवंत सिन्हा ने एक पत्र के साथ बातचीत में इसकी तस्दीक की। सिन्हा ने कहा, ‘निस्संदेह पीएमओ समय के साथ अधिक ताकतवर होता गया है। आज यह पूरी सरकार का सबसे शक्तिशाली और सबसे प्रभावी कार्यालय बन चुका है। समय के साथ पीएमओ का विस्तार हुआ है और इसने नीतियों को तय करने और उनके क्रियान्वयन में भी संबंधित मंत्रालयों पर दबदबा बना लिया।’
वैसे पीएमओ के चरित्र में बदलाव का दौर 1960 के दशक में ही शुरू हो गया था। हालांकि प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय पीएमओ में संयुक्त सचिव स्तर का केवल एक अधिकारी होता था लेकिन लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री बनने के बाद हालात बदल गए। अंग्रेजों के समय के प्रशासनिक अधिकारी एल के झा को शास्त्री का सचिव नियुक्त किया गया था। उनके अलावा संयुक्त सचिवों की संख्या भी बढ़ाकर दो कर दी गई थी।
पीएमओ के स्वरूप में असली बदलाव तो इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद हुआ। इंदिरा ने पी एन हक्सर को अपना प्रमुख सचिव नियुक्त किया था। पीएमओ में संयुक्त सचिवों की संख्या भी बढ़ा दी गई। मनमोहन सरकार के समय पीएमओ में रहे एक अधिकारी कहते हैं, ‘हक्सर के पीएमओ में आने से इसका शक्तिशाली होना शुरू हुआ। आवंटित बजट का आकार बढ़ता चला गया और यह सरकार के लिए जटिल मामलों को संभालने का जरिया भी बनता गया।’ वह कहते हैं कि पीएमओ मूलत: एक राजनीतिक कार्यालय है और प्रधानमंत्री के सशक्त होने पर पीएमओ भी ताकतवर होता है। पीएमओ के भीतर सत्ता का संकेंद्रण इस पर भी निर्भर करता है कि प्रधानमंत्री के पद पर कौन आसीन रहा है। वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘पहले भी प्रशासनिक अमले पर पीएमओ नियंत्रण रखता रहा है लेकिन इस सरकार के समय यह काफी बढ़ गया है। हालत यह हो गई है कि मंत्रालयों की भी अहम पदों पर कोई भूमिका ही नहीं रह गई है।’























