अंतरराष्ट्रीय संबंध कभी एक जैसे नहीं होते हैं। कोई भी देश स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं हो सकता है। जरूरतें रिश्तों में गर्माहट या तल्खी पैदा करती हैं। ये एक ऐतिहासिक सत्य है कि अतीत निर्गुट होने के बावजूद भारत का झुकाव रूस की तरफ रहा। लेकिन अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में रूस का बिखरना और अमेरिका का दुनिया के फलक पर बादशाहत कायम करना भी एक सच्चाई है। आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत की मजबूती में अमेरिका अपना भविष्य देखने लगा। इसके साथ ही भारतीय नीति नियंताओं को राष्ट्र विकास में अमेरिका की भूमिका ज्यादा प्रासंगिक लगी।
इस परिप्रेक्ष्य में रूस को लगने लगा कि भारत अब उन पुराने रिश्ते को लेकर संजीदा नहीं है, लिहाजा रूस और चीन एक दूसरे के करीब आने लगे। लेकिन अब भारत ने साफ कर दिया है कि एनएसजी में सदस्यता के मुद्दे पर रूस को चीन पर दबाव बनाना ही होगा।
रूस-भारत रिश्तों में चढ़ाव-उतार
2000 के बाद सिविल न्यूक्लियर के मुद्दे पर अमेरिका और भारत के बीच करीबी बढ़ी। यही वो दौर था जब रूस को लगने लगा कि अब भारत के साथ उसके रिश्ते ठंडे पड़ रहे हैं। रूस की चिंता के पीछे वाजिब वजह भी थी। कुडनकुलन परमाणु प्रोजेक्ट पर जिस तेजी से काम होना चाहिए वो आगे नहीं बढ़ पा रहा था। वहीं परमाणु ऊर्जा के मुद्दे पर भारत की अमेरिका खुल कर तरफदारी करने लगा था। ध्यान देने वाली बात ये है कि परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में अमेरिका और रूस एक दूसरे के प्रतिद्वंदी हैं। इसके अलावा एनएसजी के मुद्दे पर रूस के रुख से भारत को निराशा हुई। भारत को लगता है कि रूस को जितनी सक्रियता दिखानी चाहिए थी, उसने नहीं दिखाई। चीन की तरफ रूस का झुकाव किसी न किसी रूप में बढ़ा है लिहाजा भारत सरकार रूस को ये संदेश देना चाहती है कि उसे अपनी भूमिका को सपष्ट करना होगा।
चीन-रूस में बढ़ी नजदीकी
भारतीय नीति निर्माताओं को ऐसा लगता है कि पिछले कुछ समय से रूस और चीन मेें नजदीकियां बढ़ी हैं। भारत को एनएसजी की सदस्यता दिलवाने में रूस अपनी ताकत का सही इस्तेमाल नहीं कर रहा है। कहीं न कहीं रूस भी इस बात को समझ रहा है कि चीन के साथ उसकी दोस्ती इस समझौते पर भारी पड़ रही है और भारत इसे टालने की कोशिश कर रहा है।
हाल ही में भारत दौरे पर आये रूस के उपप्रधानमंत्री दिमत्री रोगोजिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने इस मुद्दे को उठाया था।लेकिन भारत की ओर से इस पर कोई ठोस जवाब नहीं मिला है। जून में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और नरेंद्र मोदी की मुलाकात होनी है। लिहाजा रूस भी मोदी सरकार से रुख से परेशान है।
जानकार की राय
विदेश मामलों के जानकार बताया कि कूटनीति में सभी देश इस तरह के कदम उठाते हैं। भारत को अपने हितों को सुरक्षित रखने का अधिकार है। ये बात सच है कि चीन की तरफ रूस का झुकाव बढ़ा है जिसके बाद भारत एक संतुलित कदम उठा रहा है। एनएसजी में सदस्यता के मुद्दे पर भारत की चिंता जाएज है। भारतीय पक्ष को लगता है कि रूस को जिस तरह से अपनी भूमिका पेश करनी चाहिए वो नहीं कर रहा है। जहां तक कुडनकुलन प्रोजेक्ट का मामला है उसमें किसी भी तरह की देरी से रूस को ही नुकसान होगा।
OBOR समिट में शामिल हुए पुतिन*
वन बेल्ट, वन रोड समिट में शामिल होने के लिए पुतिन खुद चीन गए । भारत के दूसरे पड़ोसियों की तरह रूस भी यह मानता है कि OBOR का उस विवादित चीन-पाक आर्थिक गलियारे से से कोई सीधा संबंध नहीं है जो भारत के लिए संप्रभुता से जुड़ा मसला है। जबकि भारत के विचार ऐसे नहीं है, पिछले साल पाकिस्तान के साथ सैन्य अभ्यास करके भी रूस ने भारत को नाराज कर दिया था





















