मानव अधिकारों और धारणा दृष्टिकोण की, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रबल पक्षधर हूँ,
किन्तु शायद पहली बार में अपने दृष्टिकोण में कुछ पुनर्विचार चाहता हूँ,
देश के सीमावर्ती राज्यो, विशेषकर उत्तर पूर्वी राज्यो की जमीनी स्थिति अत्यधिक ज्वलनशील और भयावह हे,उन प्रदेशो में जनमत से चुनी जनजातीय सरकारों की महत्वकांशाये, कश्मीर की शेख अब्दुल्ला सरकार से अधिक भिन्न नहीं रही, वे एक तरफ तो भारत के ध्वज को प्रणाम् करते रहे है,दूसरी ओर अलगाववाद के बीज भी अपने व्याक्क्तिगत स्वार्थ की खातिर बोते रहे,
क्या है AFSPA
Armed Forces (Special Powers) Acts (AFSPA), are Acts of the Parliament of India that grant special powers to the Indian Armed Forces in what each act terms “disturbed areas”.
सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम भारतीय संसद द्वारा 11 सितंबर 1958 में पारित किया गया था।अरुणाचल प्रदेश , असम मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड के ‘अशांत इलाकों’ में तैनात सैन्य बलों को शुरू में इस कानून के तहत विशेष अधिकार हासिल थे। कश्मीर घाटी में आतंकवादी घटनाओं में बढोतरी होने के बाद जुलाई 1990 में यह कानून सशस्त्र बल (जम्मू एवं कश्मीर) विशेष शक्तियां अधिनियम, 1990 के रूप में जम्मू कश्मीर में भी लागू किया गया। हालांकि राज्य के लदाख इलाके को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया। विशेषाधिकार
इस कानून के अंतर्गत सशस्त्र बलों को तलाशी लेने, गिरफ्तार करने व बल प्रयोग करने आदि में सामान्य प्रक्रिया के मुकाबले अधिक स्वतंत्रता है तथा नागरिक संस्थाओं के प्रति जवाबदेही भी कम है।
उत्तर पूर्व या कश्मीर ही नहीं, पंजाब भी इस अधिनियम की उपयोगिता , प्रभावशीलता का सशक्त उदाहरण है, बिना लोकतंत्र और राष्ट्र की सार्वभौमिकता के मानव अधिकार बेमानी है और जो सैनिक बगैर किसी स्वार्थ के केवल और केवल मातृभूमि पर सर्वस्व न्योछावर करने पर, प्राणों का उत्सर्ग करने पर,आमादा हे, क्षमा करे , उनकी विश्वसनीयता सत्यनिष्ठा हमारे अन्य तंत्र की तुलना में अद्धितीय प्रामाणिक स्तर की हे,अतुलनीय हे ! इसमें किसी को कोई संदेह नहीं है,
इस कानून में मात्र इतना ही तो हे कि तलाशी, जप्ती और कार्रवाही के लिए, राज्य के सिविल प्रशासन से पूर्व अनुमति अनिवार्य नहीं,
लोकतान्त्रिक देश में सवैधानिक, वही है जो संसद से पारित और राज्य से प्रवर्तित हे, अतः आपस में लड़ने मरने वाले सभी राजनैतिक दलों की बिना शर्त सहमति से, 1958 से ये कानून पारित और लागू किया,तो वो ही इसकी सर्वोच्च आवश्यकता प्रतिपादित कर देता है,
अब बात रही इरोम शर्मिला की, तो उसकी वाणी से जो निकले वो,क्या वो सत्य ही हो, कुछ नितांत व्यक्तिगत कारणों से,उसके द्वारा इस महान् कानून का 16 से अधिक वर्षो से अनशन कर विरोध किया जा रहा है,करने का उसे अधिकार है और राष्ट्र के व्यापक हित परिप्रेक्ष्य में,उसकी निंदा करने का प्रत्येक भारतीय को भी उतना ही अधिकार, या कहे तो दायित्व है, क्योकि मामला देशहित का हे,
हम ईरोम की नीयत नहीं जानते, लेकिन मणिपुर की महान् जनता जनार्दन ने नोटा से भी कम 90 वोट देकर उसकी कथित मानव अधिकारों की भूमिका को बेनकाब कर दिया,अतः अब कोई दुविधा नहीं होनी चाहिए,
रही बात दोनों प्रकार के कुछ, सिलेक्टिव प्रचार तत्र र्की, तो वो देश में वैचारिक प्रदुषण फैलाने के दुष्कृत्य में, प्रज्ञा अपराध् में सदैव से लिप्त रहे हे, उन्हे समझाइश की नहीं, सदवुद्धि प्रदान करने की प्रार्थना है
न्याय और अत्याचार, सत्य और असत्य , काला और सफ़ेद, सही और गलत ये सभी गुण चरित्र सापेक्षता के सिद्धांत पर आधारित है, अंग्रेज आजाद सुभाष और भगतसिंह को अपराधी मानते थे और भारत वासी देशभक्त, मूल हे उद्देश्य, मिशन, cause, इरोम का कॉज ही देश के प्रति द्रोह का हे इसीलिए उस पर प्रकरण दर्ज है, उसके कृत्य के सामने कन्हैया जेसो के कृत्य भी मामूली है,
अनशन करना भी इन देशद्रोहियो की स्ट्रेटेजी हे, कारण है अंतराष्ट्रीय समुदाय और आप हम जैसे, देश में बैठे दयालुओ मन को,अपनी कोमलता से छू पाए, वो हो भी रहा है,
एकतरफ आतंक नक्सलवाद जारी रखो, दूसरी और शांति के मसीहा की भूमिका का आवरण भी औड़ लो, क्योकि हथियार बंद नृसंशता, असभ्य अत्याचारो का तो कोई समर्थन करने से रहा,
भारतीय संसार की अनूठी कौम है, जो हजारो वर्षो तक अमानुषिक अत्याचारो को भोगने के पश्चात् भी, राष्ट्रहित में बल की आवश्यकता नहीं समझ पाते है,
स्वामी विवेकानंद जी ने इसे पहचान कर, देशवासियो को जागृत जीवंत बनाते हुए, सर्वाधक क्महत्वपूर्ण बल को माना, कहा बल ही जीवन हे, निर्बलता मृत्यु
बल अर्थात् force,
राष्ट्र का बल AFSPA
इरोम को नोटा से भी कम मत समर्थन मिलना , प्रमाणित करता है, force द्वारा कोई अमानुषिक कृत्य नहीं किये जा रहे हे, निर्दोषता के मायने भी सबके लिए भिन्न भिन्न है
गांधी जी द्वारा असहयोग सविनय अवज्ञा और सत्य के प्रति आग्रह सत्याग्रह को स्वतंत्रता प्राप्ति का साधन बनाना पसंद किया गया और शांति के नोबल हेतू नामांकित करा, महात्मा घोषित कराने, राष्ट्रपिता की पदवी लेने में सफल हुए,
वहीँ दूसरी और लोकमान्य तिलक, गोपालकृष्ण गोखले, विपिन्द्र चंद्र पाल सरीखे नेतृत्व से , देश में बल पूर्वक प्रतिक्रिया व्यक्त करने का सामर्थ्य प्राप्त हुआ, सावरकर, सुभाष, आजाद, भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु, अशफाक आदि इसकी परिणीति थे,
प्रोपोगेंडा और प्रचार, अवधारणा की निर्मति करते हे,उसी दृष्टिगत न् केवल राज्य बल्कि राजनेतिक दलों ने, लक्ष्य प्राप्ति हेतु इस अचूक अस्त्र का सदैव दोहन किया,देश के शत्रु तो एक कदम आगे जा वितंडावाद में लगे रहते है,
इरोम का 16 वर्षो का अनशन युक्त प्रचार, इसी का रिफाइंड उदाहरण है,सबको स्पस्ट हे कि जब तक भारत की संप्रभुता हे तब तक Afspa नहीं हटेगा, अधिक प्रभावी भले ही हो जाए, लेकिन इस का विरोध कर दुनिया में भारत की पवित्र छवि बिगाड़ने का इन तत्वो का मंसूबा पूरा होता रहा है,विश्व् की महाशक्तियां और उनकी सेनाओं का रिकॉर्ड इस मामले में, बहूत अनुदारवादी कठोर रहा है, अतः इन तत्वो को समर्थन मिलने से रहा, बस ये भारत की महान् सेना के विरोध में, कुछ चर्चारूपी प्रदुषण फैलाने में, कामयाब हो जाते थे, मणिपुर वासियो ने उनकी वो हसरत भी मिट्टी में मिला दी
सेना व् Afspa का प्रबल समर्थक
राजनीति में , दलों में, व्यक्तियो में, सबकी अपनी अपनी रूचि हो सकती है, होना ही चाहिए, लेकिन हमारे देश में दो स्तंभ सेना और संविधान की रक्षा करने वाली न्याय पालिका, कुछ विसंगतियो के पश्चात् भी , एक देश की रक्षा में तत्पर है , दूसरा शोषित पीड़ित वंचितों को जितना संभव हो गुणात्मक समाधान दे रहा है,
अब राष्ट्र के मूल प्रतीकों , अंगों के प्रति तो एकजूटता रखना, सुसंस्कार ही होना चाहिए, इसमें सात रंग की दुनिया के,सात तरह के विचार होना अनिवार्य तो नहीं है
इसका क्या अर्थ है? उसका एकमात्र उद्देश्य afspa तो हटाना ही हे, आज अगर कश्मीर और ये सात राज्य भारत में हे तो उसका सबसे महत्वपूर्ण कारण ये अधिनियम हे,
आप सोचे की तमाम मतभिन्नताओ के पश्चात् भी कश्मीर में सर्वानुमति से इसे 1990 से प्रभावी किया गया,
जब तक भारत में अपनी स्वयं की संप्रभुता हे, राज्य शक्ति है, afspa है,जो 1958 में पंचशील व् शांति के पुजारी नेहरू का बनाया कानून हे, इसकी कारगरता पंजाब में, कश्मीर में, और नार्थ ईस्ट में देख ही चुके है,
कानून केवल 2 ढाई पेज का छोटा सा हे, उसे पढ़े, हो सकता है, गेंहू के साथ घुन पिस गया हो ,लेकिन इससे, कानून में संशोधन निरसन की मांग पर ध्यान देने का सीधा अर्थ, देश की सुरक्षा को असीमित खतरे में झोकना,
इसे कोई बर्दाश्त नहीं करेगा, कोई भी regime हो, यह कानून मानव अधिकारों को कुछ सीमित करता है, समाप्त नहीं, जो सही है उसे चिंता नहीं होना चाहिए,
देश के प्रत्येक नागरिक को जीने की, अभिव्यक्ति की ,संपति की, रहने की, उपासना करने , का पूर्ण अधिकार है,
इसीलिए तो सरकार उसे व्रत करने में सहयोग दे रही है, उसे भी चिकित्सा सहायता दे, सरकार ही तो बचा रही है, सरकार ने कभी भी कोई कार्रवाही उसके अनशन को लेकर नहीं की,
पर कुछ लोगो के मानव अधिकार जब अनेको अनेको के मानव अधिकारों को कुचलने लगते है, राष्ट्र की संप्रभुता को आघात करने वाले हो जाते हे तो, संविधान उनको नियंत्रित करने की अनुमति देता है ,
इसी तरह व्यक्ति की स्वतंत्रता के ऊपर समूह और उस पर भी राष्ट्र को तरजीह दी जाती है,
इरोम से किसी को कोई शिकायत क्यों होगी, उसकी मांग से आपत्ति है, जिसके कारण संयुक्त राष्ट्र से लेकर विश्व् भर में भारत विरोधी , हमारे देश को, पाकिस्तान जैसे मानव अधिकारों के हनन करने वालेनिकशट देश की श्रेणी में ले जा, छबि बिगाड़ अपमानित करने के कुत्सित प्रयास करते हे,
अतः इरोम से केवल इतनी शिकायत थी , अब वो भी नहीं क्योकि मणिपुरियो ने नोटा से भी कम वोट दे, उसे forced सद्बुद्धि दे दी, उम्मीद है अब वो भारत विरोधी वितंडावाद का हिस्सा नहीं बनेगी, शुभकामनाये






















