इसे समझना होगा, यदि आज के विद्यार्थी हमारे परिजन इन विचारों की और आकर्षित हो रहे हे तो ऐसा क्या है?
क्या हमारा सिस्टम फ़ैल हो गया,
क्या व्यवस्था लोगो की विचारो आकांक्षाओ का प्रतिनिधित्व नहीं करती?
क्या हम युवाओं के मन की बात समझ नहीं पा रहे हे, और एक पुराने ज़माने के बुजुर्ग की तरह हमसे भिन्न धारणा को, उसी तरह रौंद देना चाहते है, जैसे की हमारे पहले की पीढ़िया करती रही, यदि देश में 18 करोड़ मात्र ही देशभक्तो की श्रेणी में रखेंगे तो , इसी से देश बनाएंगे, विद्यार्थी अतिवादी हो सकते हे, आजाद भगतसिंह भी थे, पर गुरुजन को तो सनातन संयम का, नीर क्षीर विवेक का पालन करना होगा, कोई पक्ष गलत नहीं, दृष्टिकोण और धारणाएं हे, दृढ़ नहीं रहती बदलती है, उम्र, देश , काल , परिस्थिति से, गतिशीलता ही जीवन हे, कठोरता स्थिरता मृत्यु, यह संभव नहीं होगा कि कोई एक तय मार्ग का अनुसरण करना बाध्यता हे, हमारे संविधान में प्रत्येक नागरिक को उसके विशिष्ट अधिकार है, उसके अपने , वो तय करेगा हम नहीं, हम उसके दृष्टिकोण को समझे बिना यदि उसे समझाने में टूट पड़ेंगे तो वो ही टूट जाएगा, फिर किसे देशभक्ति का पाठ पढ़ाएंगे, हमारी अच्छी कोशिशो का भी अपेक्षित परिणाम नहीं निकलेगा, *एक सत्यम् बहु विप्र वदन्ति* सबका अपना अपना सत्य है, अपने अनुभव है, अपना परिवेश हे, ठीक है, जो हमारे विचार 15 20 वर्ष की उम्र में थे आज क्या उसमे परिपक्वता नहीं आयी, परिष्कार नहीं हुआ, उन बच्चों में भी आएगी, यदि आप उन्हें अपनई भारतीयता से मुक्त न् कर देवे, जैसे हमारे पुराने कर्मकांडी बुजुर्ग छुआछूत जातिप्रथा जैसी कुरीतियो में पद कर राष्ट्र को कमजोर कर गुलाम बना बैठे, झूठे और खोखले अहंकार में, क्या हम भी 2017 में वो फिल्म नयी डिजिटल टेक्नोलॉजी से नयी स्टार कास्ट से बनाये, लोगो को कम से कम सनातन में थोड़ी भी आस्था की चिंगारी दिखे उसे, पकड़ो, दुत्कारो नहीं, राजनीतिक दलों के आधार पूर्णतया अस्थायी होते है, 70 वर्ष की तपस्या के पश्चात् देश की हिंदूवादी पार्टी को 19 करोड़ वोट मिले, कांग्रेस को 10 करोड़, ममता को 2 करोड़, सपा को 2 करोड़, वीजू को 2 करोड़, माया और कम्युनिस्टों, अकाली, शिवसेना, नितीश , केजरी, तेलगू देसम आदि सब को 1-1 लोगो ने पसंद किया, 130 करोड़ का देश है भाई , जरुरी नहीं की सब हमारी तरह ही वो सोचे, वो ही विचार जो हम तय करे, हमें अभिव्यक्ति का हक़ है तो उन्हें आलोचना का, क्या हम ताकत की जोर पर प्राचीन भीभत्सव कबीलाई प्रणाली, जोर की दरिंदगी की, जैसे काले झंडे वाले सीरिया में यमन में कर रहे हे या कश्मीर में1990 से पहले से चल रही है अपने ही लोगो के प्रति कर उन्हें विद्रोही तो नहीं बना देंगे, इतिहास गवाह है बड़े से बड़े हुक्मरान भी जंगे आजादी के क्रांतिवीरों से जीत न् पाए, हमें देश बनाना है, राष्ट्रभक्ति जुल्म अत्याचार से पैदा नहीं की जा सकती, कितने हिन्दुओ ने हजारो वर्षो में प्रलोभनों या अत्याचारो के वशीभूत हो इस्लाम या ईसाई पंथ अपनाया, आज फिर सजग मार्गदर्शक सामाजिक समरसता की बात कर रहे हे, क्यों कि इसके सिवाय कोई उपाय ही नहीं है, दोषी दोनों पक्षो के छात्र नहीं, हम जैसे कथित बुजुर्ग बुद्दिजीवी हे जो न्याय के स्थान पर आसीन होने के स्थान पर मानवीय कमजोरी वश पक्ष बन जाते हे, या मौन धारण कर प्रेक्षण करते रहते है, छोटी छोटी जीते जीत कर हम बड़े लक्ष्य को न् हारे,
शेष अगले अंक में,
*वन्दे मातरम्* किसी का कॉपीराइट नहीं मेरा या किसी भी अन्य देशभक्त का भी नहीं
[28/02, 12:35 AM] Chandra Shekhar Vashistha: इसे समझना होगा, यदि आज के विद्यार्थी हमारे परिजन इन विचारों की और आकर्षित हो रहे हे तो ऐसा क्या है?
क्या हमारा सिस्टम फ़ैल हो गया,
क्या व्यवस्था लोगो की विचारो आकांक्षाओ का प्रतिनिधित्व नहीं करती?
क्या हम युवाओं के मन की बात समझ नहीं पा रहे हे, और एक पुराने ज़माने के बुजुर्ग की तरह हमसे भिन्न धारणा को, उसी तरह रौंद देना चाहते है, जैसे की हमारे पहले की पीढ़िया करती रही, यदि देश में 18 करोड़ मात्र ही देशभक्तो की श्रेणी में रखेंगे तो , इसी से देश बनाएंगे, विद्यार्थी अतिवादी हो सकते हे, आजाद भगतसिंह भी थे, पर गुरुजन को तो सनातन संयम का, नीर क्षीर विवेक का पालन करना होगा, कोई पक्ष गलत नहीं, दृष्टिकोण और धारणाएं हे, दृढ़ नहीं रहती बदलती है, उम्र, देश , काल , परिस्थिति से, गतिशीलता ही जीवन हे, कठोरता स्थिरता मृत्यु, यह संभव नहीं होगा कि कोई एक तय मार्ग का अनुसरण करना बाध्यता हे, हमारे संविधान में प्रत्येक नागरिक को उसके विशिष्ट अधिकार है, उसके अपने , वो तय करेगा हम नहीं, हम उसके दृष्टिकोण को समझे बिना यदि उसे समझाने में टूट पड़ेंगे तो वो ही टूट जाएगा, फिर किसे देशभक्ति का पाठ पढ़ाएंगे, हमारी अच्छी कोशिशो का भी अपेक्षित परिणाम नहीं निकलेगा, *एक सत्यम् बहु विप्र वदन्ति* सबका अपना अपना सत्य है, अपने अनुभव है, अपना परिवेश हे, ठीक है, जो हमारे विचार 15 20 वर्ष की उम्र में थे आज क्या उसमे परिपक्वता नहीं आयी, परिष्कार नहीं हुआ, उन बच्चों में भी आएगी, यदि आप उन्हें अपनई भारतीयता से मुक्त न् कर देवे, जैसे हमारे पुराने कर्मकांडी बुजुर्ग छुआछूत जातिप्रथा जैसी कुरीतियो में पद कर राष्ट्र को कमजोर कर गुलाम बना बैठे, झूठे और खोखले अहंकार में, क्या हम भी 2017 में वो फिल्म नयी डिजिटल टेक्नोलॉजी से नयी स्टार कास्ट से बनाये, लोगो को कम से कम सनातन में थोड़ी भी आस्था की चिंगारी दिखे उसे, पकड़ो, दुत्कारो नहीं, राजनीतिक दलों के आधार पूर्णतया अस्थायी होते है, 70 वर्ष की तपस्या के पश्चात् देश की हिंदूवादी पार्टी को 19 करोड़ वोट मिले, कांग्रेस को 10 करोड़, ममता को 2 करोड़, सपा को 2 करोड़, वीजू को 2 करोड़, माया और कम्युनिस्टों, अकाली, शिवसेना, नितीश , केजरी, तेलगू देसम आदि सब को 1-1 लोगो ने पसंद किया, 130 करोड़ का देश है भाई , जरुरी नहीं की सब हमारी तरह ही वो सोचे, वो ही विचार जो हम तय करे, हमें अभिव्यक्ति का हक़ है तो उन्हें आलोचना का, क्या हम ताकत की जोर पर प्राचीन भीभत्सव कबीलाई प्रणाली, जोर की दरिंदगी की, जैसे काले झंडे वाले सीरिया में यमन में कर रहे हे या कश्मीर में1990 से पहले से चल रही है अपने ही लोगो के प्रति कर उन्हें विद्रोही तो नहीं बना देंगे, इतिहास गवाह है बड़े से बड़े हुक्मरान भी जंगे आजादी के क्रांतिवीरों से जीत न् पाए, हमें देश बनाना है, राष्ट्रभक्
[28/02, 9:32 AM] Chandra Shekhar Vashistha: अनुराग् हम फिर गलती न् करे केवल आपके या मेरे या अजीत के विचारों को ही सही न् माने, विचार हो सबके अपने दृष्टिकोण से सही है, कमल डॉ अजीत सभी के अपने अपने विचार हे, कुछ भावनाओ पर आधारित कुछ धारणाओं पर, क्या उसे उसी परूप में व्यक्त करना है, अथवा सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय हेतू उसमे लचीलापन ला सके, अभी हाल ही में परमपूज्य संघ प्रमुख ने उज्जैन में ही व्यक्त किया कि हमें *बड़ा संघठन नहीं बनाना अपितु समाज को ही संगठित करना है*, इसके लिए ही समावेशिता आवश्यक प्रतीत होती हे, क्रमशः🚩🔔🌙☘🌹💐🙏
[28/02, 9:40 AM] Chandra Shekhar Vashistha: आ यही मेरे विचार का मूल हे कि *हर विचार से असहमत हुआ जा सकता* और *हर विचार अपनी जगह सही है, और कोई भी विचार अंतिम सत्य नहीं है, न् में न् आप न् कोई और* 👍
[28/02, 9:50 AM] Chandra Shekhar Vashistha: लोकेंद्र इजराइल में और हममे किसी तरह का साम्य नहीं, न् भौगोलिक न् सामाजिक, भाषायी, जातीय, व्यवहार व् अन्य तमाम विभिन्नताएं हमें जर्मनी या इजराइल की तरह व्यूह रचना में सक्षम नहीं कर पाती, होना चाहिए में आपसे सहमत हूँ🙏
[28/02, 10:06 AM] Chandra Shekhar Vashistha: अब नीति तो संविधान में तय है जिसमे हमारे पूर्वजो ने , मनुष्य की स्वतंत्रता को उच्च स्थान दिया है, अब तो आप हम कोई भी इस प्रणाली को बदल नहीं सकते , इसी प्रणाली में सड़ते रहना होगा, बिना एक और क्रांति के, और क्रांति जे लिए क्या हम तैयार है?
[28/02, 10:16 AM] Chandra Shekhar Vashistha: आपके विचार सर्वथा योग्य है, किंतु पाकिस्तान तो मोहरा मात्र है, हमारे सबसे बड़े और स्थायी शत्रु चीन का, ये पाक उसी प्रकार का गली का गुंडा हे हो अपने मालिक के कहने पर हलकट उत्पात करतत् हे, और निर्देश मिलने पर चुप हो जाता है, चीन इसका नियंत्रक हे, और चीन इसके द्वारा भारत को लंबे समय , या हमेशा से ब्लैकमेल करता है अपनी बात हित साधने के लिए, 👍
[28/02, 11:41 PM] Chandra Shekhar Vashistha: विवेक जी इसमें जो भी किरदार हे, सभी घोर अफसोसजनक हे,
पूरा एपिसोड ही दुर्भाग्यपूर्ण है, ऐसा लगता है कि युवा भ्रमित हे, उन्हें सुसंस्कारित करने की आवश्यकता है,
अभिव्यक्ति व् विचारो की सीमा की समझ व्यक्ति को संस्कारो से मिलती है,
आजकल के स्वच्छन्द और उन्मुक्त जीवन के इच्छुक भोगवादी युवाओं ,
उनकी अपनी सोच ही अच्छी लगती है,
परमपूज्य ने इसी वैचारिक प्रदुषण के दुष्प्रभावो से हमको , समाज को , अवगत करा,
कि *जो जैसा सोचता है और करता है वो वैसा ही बन जाता है*
हमें श्रेष्ठ आदर्शो की और चलने की प्रेरणा ही नहीं, पूरा वातावरण दिया,
अब ये इन युवाओं का दुर्भाग्य है कि उन्हें श्रेष्ठ सद्गुरु से सदज्ञान नहीं मिला पाया या उन्होंने लेना पसंद नहीं किया,
विवेक जी , अब मार्ग तो उन्हें ही चुनना हे, हमने ईश्वर की कृपा से, *व्यक्ति से परिवार और उससे समाज फिर उससे राष्ट्र के सुधार की महती युग निर्माण योजना*
में कार्य करने का , स्वयं व् लोगो को सन्मार्ग में प्रवर्त रहने का ,
शुभ् पवित्र कल्याणकारी कार्यो से युक्त रहने का प्रयास करने का संकल्प प्रभु की कृपा से लिया है, ये भाग्य हे ,
ये हमारे प्रयासों में कमी है कि ऐसे छात्र उत्पन्न हो रहे हे, आज नहीं तो कल कोई न् कोई इन भटके हुए लोगो को सन्मार्ग में प्रवर्त करेगा,
नहीं तो फिर कानून की परिधि में आएंगे तो भोगेंगे, पर हम ऐसा नहीं चाहते आखिर हमारे ही भारतवासी भाई बंधू हे,
अंततः *धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियो में सद्भावना हो और विश्व् का कल्याण हो*,
की हमारी महान् संस्कृति की और अवश्य लौटेंगे,
वन्दे मातरम्
🚩🌙🔔☘🌹💐🙏
[01/03, 12:29 AM] Chandra Shekhar Vashistha: बिल्कुल, प्रबोध् जी में आपसे पूर्ण सहमत हुँ , *राष्ट्र हित सदैव सर्वोपरि* है,
पर लोग अपने अपने तरह से इसे खोखला करने में जुटे हे,
शायद हम युवा पीढ़ी को आदर्श प्रस्तुत नहीं कर पाए, जैसे भी हो सभी प्रकार के उपाय, जो जिसे उचित लगे करे,
हम भी स्वाध्याय सत्संग सेवा का , जान जागृति का प्रकल्प तैयार करे, आप तो कर ही रहे हे,
वो ही तो हम सब भी करे, लोगो को जागृत और जीवंत बनाये, सन्मार्ग के लिए प्रेरित करे,🙏
[01/03, 1:09 AM] Chandra Shekhar Vashistha: अनिल जी, दो दिन से यही एपीसोड चल रहा है मेने तो इसे देखा भी नहीं था, अब पड़ा , पर मित्रो की लगातार बिभिन्न पक्ष की पोस्ट से ये चर्चा में हे,
सबको अपने अपने विचारों की स्वतंत्रता हे जब तक कि उसमें कोई गैरकानूनी तत्व न् हो,
सब में शहीद की बेटी और छात्र दोनों हे,
इन दोनों से सहमत, असहमत और निरपेक्ष हुआ जाना प्रत्येक का संवेधानिक अधिकार है, हम किसी को किसी और के विचारों को पसंद करने हेतु बाध्य नहीं कर सकते, और यदि विचार पब्लिक डोमेन में दिया है तो सभी अपनी अपनी तरह से आलोचना करने , मत व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र है, क़ानून की सीमा में,
मेरा विचार इस विषय के मूल में जाने का हे, व्यक्ति के संस्कार, मेने हमेशा लिखा है कि व्यक्ति की धारणा, उसके विचार, उसका दृष्टिकोण,
प्रायः उसके अनुभव, परिवेश, वातावरण, ज्ञान पर निर्भर होता है,
अतः प्रत्येक के अपने अलग विचार होते है, जरूरी नहीं की भावो को व्यक्त करने के लिए व्यक्ति आपकी या अन्य की इच्छानुसार अच्छे शब्दो का सहारा लेने, उपयोग कर पाने में समर्थ हो,
कई बार सीमित exposure संप्रेषण को प्रभावित करता है अतः इसके वे ही अर्थ निकाले जाने चाहिए जो मूल द्वारा निर्धारित हो,
अब इसमें भी सबको अपने विचार बनाने की स्वतंत्रता होनी चाहिए
[02/03, 12:30 AM] Chandra Shekhar Vashistha: शैलेन्द्र भाई आप भी सदैव आदरणीय हे और विद्धान भी, चर्चा और विचारविमर्श अच्छे और विकसित समाज की पहचान है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आवश्यकता सभ्यता को विकासशील बनाने का अनिवार्य घटक है, राष्ट्र धर्म और देशभक्ति एक ऐसी पवित्र अवधारणा हे कि अनेको लोगो को प्राणों से प्यारी हे, इसीलिए तो हमारे स्वतंत्रता सेनानियो ने वीर क्रान्तिकारियो ने अंग्रेजो के क़ानून तोड़कर, तत्समय हिंसा का मार्ग अपनाकर, आत्म बलिदान देना श्रेयस्कर माना, ख़ुशी ख़ुशी फांसी के फंदे पर चढ़ गए , न्योछावर हो गए, अमर शहीद आजाद, भगतसिंह , सुखदेव , राजगुरु, सुभाष, सावरकर, तिलक — – – –
देशवासियो के असली हीरो सदैव वीर शहीद ही रहे और रहेंगे, किसी भी राष्ट्र हेतू ये मूल अनिवार्यता भी हे , कि उसके ऐसे सपूत हो जो मातृ भूमि हेतू सर्वस्व देवे, हमें उन पर गर्व है , राष्ट्र व् प्रत्येक भारतीय उनका सदैव ऋणी हे,
ऐसी स्थितियो में देश के गौरव के प्रतिकूल या कम सम्मानजनक आचरण किसी पक्ष का कोई भी देश भक्त देखता है तो उसका खून खोलना , आक्रोशित हो, जिस तरह से संभव हो क्रोध व्यक्त करना, स्वाभाविक ही हे, अब इसे जो भी असहिष्णुता मानो या अतिवाद या कुछ भी बोलो पर जहा राष्ट्र होगा बहा उसके सामान्य के साथ अतिवादी भक्त होने ही चाहिए, विचारो की विभिन्नता हो या किसी की कोई भी जीवन शैली भारतीय समाज आमतौर पर समावेशी हे, वो सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है , पर अनेक शताब्दीओ तक भुगतने के बाद, अब अपने धर्म के और अपने राष्ट्र के कोर विचार पर अब कोई आघात सहन नहीं कर पाता , विचलित हो मुखर हो, टूट पड़ना चाहता है, सही भी हे,
वो महान् शहीद जवान की पुत्री भी किसी और से कम निष्ठावान भारतीय नहीं होगी, उसने तो स्वयं अपना पिता बचपन में इस देश पर न्योछावर कर दिया, उससे अधिक तपस्वी दानी भाग्यशाली कौन होगा,
मेने पूर्व में भी लिखा है, एक्सपोज़र के अभाव में अपने दृष्टिकोण के सकारात्मक संप्रेषण से असफल होना, भी विवाद की बढ़ी वजह दिखती है,
*यह परम् सत्य है कि संसार में अधिकाँश लोग युद्ध नहीं शांति चाहते है*
सारे विश्व् का और उसकी संस्था का तो मूल लक्ष्य ही *Peace शांति* हे , अब यदि बात भारतीय संस्कृति की करे तो इसके तो प्रारम्भ से अंत तक प्रत्येक कर्मकांड में, हर मन्त्र , हर प्रार्थना विधि के प्रारम्भ व् पश्चात् में शांति पाठ की अनिवार्यतः इसीलिए हे की सर्वाधिक महत्व पूर्ण *शाँति* हे,
*दैनिक जीवन व्यवहार में भी , हर कर्म के पश्चात् शांति की प्रार्थना की जाती है युद्ध की नहीं*,
सनातन संस्कृति में शांति का आव्हान श्रेष्ठ माना गया है , अतः युद्ध में अपने पिता को, सर्वस्व को ,खो चुकी छात्रा द्वारा युद्ध के स्थान पर शांति के आव्हान से तो शायद ही कोई क्रोधित होगा, तो फिर क्या हमारे स्थायी शत्रु एक निकृष्ट असफल और अराजक देश पाकिस्तान से शांति बनाने के आव्हान से लोग खफा हे?
क्या मालूम, क्योकि भारत सरकार की आधिकारिक नीति पाकिस्तान से शांति व् मित्रता रखना है, हमारे देश के पीएम, पाकी राष्ट्रपति से निजी मित्रता प्रेम प्रदर्शित करते हे, पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करने के अभियान भारतीय पूरी दुनिया में चला रहे हे , लेकिन अपने देश की सरकार ही इससे इंकार करती है, तो फिर विवाद किस बात का हे, दोनों तीनो या सब छात्र दल इस वितंडावाद में उलझकर अपना और देश का समय क्यों नष्ट कर रहे हे, कुछ पढाई लिखाई करेंगे या शांति सौहाद्र रखे ,
तो देश का अधिक भला हो सकेगा शायद,
हमारा देश लोगो के वादविवाद मंशा से, सुझाव और मांग से नहीं संविधान और कानूनों से चलता हे, यदि कोई पक्ष कोई गैरकानूनी कृत्य करता है या अपनी नजर में राष्ट्र द्रोह करता दीखता हे तो तुरंत कानूनी कार्रवाही अधिक उपयोगी और समाज के दूरगामी हितों में रहती है बजाये अपशब्दों के प्रयोग के, ऐसे समय में हमारे ऋषि मुनि महापुरुष संतो की कही बाते अत्यन्त प्रासंगिक हो जाती है कि
ॐ सहनाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ॥
*ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः* ॥
यह शान्ति मंत्र श्वेताश्वतरोपनिषद से है, जो कृष्ण यजुर्वेद शाखा का उपनिषद है
भावार्थ: *हे प्रभु ! आप हम सभी की रक्षा करें… हम दोनों का पोषण करें… हम दोनो को शक्ति प्रदान करें… हमारा ज्ञान तेजमयी हो… और हम किसी से द्वेष न करें*
🚩🔔🌙🔱🏹☘💐🙏
[28/02, 10:25 AM] Chandra Shekhar Vashistha: डा सा आप स्वभाव से ही क्रांतिवीर हे, जिन्हें आजकल लोग अतिवादी अर्थात् Extremist अर्थात् आतंकी कहते हे, आपके विचार सदैव अभिनंदनीय और हमारे जैसे लोगो के प्रेरणा स्त्रोत है, लेकिन इस लचर संसदीय व्यवस्था से देश के युवाओं में गहरी निराशा हे, वे हमसे समाधान चाहते है, न् मिलने पर वामपंथ जैसी प्रणाली जो की मनुष्य को केंद्र में रख, बरगलाती हे की और आकर्षित होते है, आप उस शहीद की बेटी या छात्र दल की बात छोड़ वृहद व्यापक परिवेश में चिंतन मंथन करे, इसमें समय ले , शीघ्रता नहीं, हमें बड़े लक्ष्य ध्येय प्राप्त करने हे👍
[28/02, 11:29 AM] Chandra Shekhar Vashistha: 🚩 *माँ भारती ! जीयुंगा तेरे लिए और मरूंगा तेरे लिये*
जो देश के विखंडन की बात करे, आतंकवाद का समर्थन करें, सांप्रदायिक वैमनस्य पैदा करे निःसंदेह वह देशद्रोही है और उसे देश के कानून के तहत सजा मिलनी चाहिए। पर देशद्रोह और राजद्रोह में अंतर है। अंग्रेज सरकार ने आजादी की मांग करने वाले सरदार भगत सिंह जैसे युवा देशभक्तों पर राजद्रोह के मुकदमें चलाए थे। पर आजाद भारत में राजद्रोह के आरोप लगाकर किसी को प्रताड़ित नहीं किया जा सकता। क्योंकि चुनी हुई सरकार भी केवल एक तिहाई मतों से ही सत्ता में आती है। यानि दो तिहाई मतदाताओं का उसे समर्थन प्राप्त नहीं होता। जाहिर है कि ऐसे मतदाता चुनी हुई सरकार से मतभेद रखते हैं। इसलिए लोकतंत्र में उन्हें अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त करने की छूट होती है। इसलिए सरकार का विरोध करना राजद्रोह होता है। राजद्रोह को देशद्रोह नहीं माना जा सकता और देशद्रोह करने वाले को माफ नहीं किया जा सकता।
आज देशद्रोह को लेकर देश में एक बहस चल रही है। जहां राजद्रोह और देशद्रोह के भेद को गड्ड-मड्ड कर दिया गया है। आम लोग दोनों में अंतर कर पा रहे, सभी लोग इस फर्क को समझते हैं, उन्हें कोई भ्रांति नहीं है। वे मानते हैं कि भारत की संप्रभुता और सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। लेकिन साथ ही उनका यह भी कहना है कि जो अपराध् माफिया प्राकृतिक संसाधनों का नृशंसता से, रात-दिन अवैध दोहन लूट कर रहा है और उन इलाकों में रहने वाले जनजातीय लोगों के जीने के साधन छीनकर उन्हें महानगरों की गंदी बस्तियों में धकेल रहा है, क्या वे देशद्रोही नहीं है ?
जो बिल्डर माफिया निर्बल वर्ग की जमीनों का ‘लैंड यूज’ बदलवाकर उन पर बहुमंजिली इमारतें खड़ी कर अरबों के कारोबार कर रहा है, क्या वे देशद्रोही नहीं है ?
जो उद्योगपति बैंकों से लाखों रूपया कर्जा लेकर डकार जाते हैं, ब्याज देना तो दूर मूल तक वापिस नहीं करते और इस देश के आम लोगों की मेहनत की कमाई को हड़प कर गुलछर्रे उड़ाते हैं, क्या वे देशद्रोही नहीं हैं ?
सीमा पर जान की बाजी लगाने वाले सेना के नौजवानों के लिए खरीदे जाने वाले सामान और आयुध की खरीद में जो अरबों रूपये का कमीशन डकार जाते हैं, क्या वे देशद्रोही नहीं हैं ?
सारे देश में गरीब किसानों के नौजवान बेटों से पुलिस में या स्कूल में अध्यापक की नौकरी देने के लिए जो रिश्वत लेते हैं, क्या ये लोग देशद्रोही नहीं हैं ?
भारत के मुख्य न्यायाधीश और अन्य जज तक ये बात सार्वजनिक रूप से मान चुके हैं कि अदालतों में नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचार व्याप्त है, तो क्या भ्रष्टाचार करने वाले जज देशद्रोही नहीं हैं ?
पर देशद्रोह के नाम पर आज देश में जो बहस चल रही है, उनमें ये सवाल नहीं उठाए जा रहे। इसलिए इस बहस का कोई दूरगामी परिणाम निकलने वाला नहीं है। यह भी एक और भावनात्मक मुद्दा बनकर कुछ ही दिनों में पानी के बुलबुले की तरह फूट जाएगा। क्योंकि बुनियादी सवाल खड़े किए बिना, उन पर बहस किए बिना, उनका समाधान खोजे बिना, ये मतभेद खत्म नहीं होगा। यह बात सरकार और उसके समर्थन में खड़े हर आदमी को समझ लेनी चाहिए, चाहे वो किसी भी दल का क्यों न हो। क्योंकि कोई भी दल सत्ता में क्यों न आ जाए, उसके तौर-तरीके हालात में बहुत बुनियादी बदलाव नहीं ला पाते। इस विषय में वामपंथी दल भी कोई अपवाद नहीं है।
केरल और पश्चिम बंगाल में जहां लंबे समय तक जनता ने वामपंथी सरकार का काम देखा है, वहां की जनता यह कहने में कोई संकोच नहीं करती कि इन सरकारों ने आम आदमी की हैसियत में कोई सुधार नहीं किया, उसकी बदहाली दूर नहीं की। इतना ही नहीं इन सरकारों ने लोकतांत्रिक मूल्यों का भी स्म्मान नहीं किया। नतीजतन वामपंथी सरकारों के विरूद्ध गुस्साई युवा पीढ़ी को नक्सलवाद का सहारा लेना पड़ा।
इस परिप्रेक्ष्य में जेएनयू के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया का, रिहाई के बाद का, भाषण बहुत महत्वपूर्ण है। जहां एक तरफ उसने अपना वही तेज-तर्रार तेवर कायम रखा है और अपने तर्कों से स्वयं को निर्दोष बताते हुए सरकार की खुलकर खिंचाई की है, वहीं कन्हैया ने क्रांति का अपना लक्ष्य जोरदारी से उठाया है। जिससे उस पर लगे देशद्रोह के आरोप की धार भौंथरी हुई है।
पर प्रश्न ये है कि मुट्ठी हवा में लहराकर मनुवाद का विरोध करने वाले वामपंथी कभी कठमुल्लेपन का और शरीयत का ऐसा ही जोरदार विरोध करते नजर क्यों नहीं आते, उनके इस इकतरफा रवैए से क्षुब्ध होकर ही वृह्द हिंदू समाज उन्हें देशद्रोही करार दे देता है। उधर वामपंथ की विचारधारा अपने जन्मस्थलों में ही असफल सिद्ध हो चुकी है। भारत में भी इसका प्रदर्शन कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाया। इसके बावजूद क्या वजह है कि कन्हैया जैसे नौजवान केवल वामपंथ के रटे रटाए नारे लगाते हैं। पर उनके पास जनसमस्याओं के हल के लिए कोई ठोस समाधान उपलब्ध नहीं है। वे तो यह भी गारंटी नहीं ले सकते कि अगर कभी उनकी सरकार आ गई, तो उनके पास समाधान और विकास का कारामद ब्लू प्रिंट तैयार है ?
ऐसा कोई ब्लू प्रिंट है ही नहीं, होता तो अब तक उसके परिणाम दुनिया में दिखाई देते। एक असफल विचारधारा को मरे सांप की तरह गले में लटकाने से कोई क्रांति नहीं होने जा रही।
रही बात व्यवस्था से लड़ने के लिए हिंसा अपनाने की, तो वैदिक संस्कृति का प्रमुख ग्रंथ भगवद् गीता ही हिंसक युद्ध की वकालत करता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि आताताइयों, अत्याचारियों और देशद्रोह करने वालों से युद्ध लड़ना और उन्हें मार डालना, पुण्य प्राप्ति का मार्ग है, पाप का नहीं।
माक्र्सवाद और गीतावाद के रास्ते अलग हो सकते हैं, पर लक्ष्य दोनों का समाज को सुखी और संपन्न बनाना है। अपने प्रयोग में विफल रहे माक्र्सवादियों को चाहिए कि अब कुछ दिन सनातन वैदिक ज्ञान और गीतावाद का प्रयोग करके देखें। उस ज्ञान का जिसका प्रकाश हर विषय पर समाधान देता है। पर उसे समझने और अपनाने का कोई ईमानदार प्रयास कभी हुआ नहीं। दूसरी तरफ दुनियाभर के देश खुलेआम या चोरी-छिपे सनातन वैदिक ज्ञान को आधार बनाकर भविष्य की संभावित जीवन पद्धति पर शोध कर रहे हैं। जबकि भारत में हम आज भी इस बहुमूल्य ज्ञान का उपहास उड़ा रहे हैं। इसे समझकर, विवेकपूर्ण तरीके से अपनाकर ही हम अपने समाज का भला कर सकते हैं।
राजद्रोह यानी आईपीसी (भारतीय दंड संहिता) की धारा-124 A, क्या कहती है?
कोई भी आदमी यदि देश के खिलाफ लिखकर, बोलकर, संकेत देकर या फिर अभिव्यक्ति के जरिये विद्रोह करता है या फिर नफरत फैलाता है या ऐसी कोशिश करता है, अर्थं व्यक्ति सरकार-विरोधी सामग्री लिखता या बोलता है या फिर ऐसी सामग्री का समर्थन करता है, या राष्ट्रीय चिन्हों का अपमान करने के साथ संविधान को नीचा दिखाने की कोशिश करता है, तो उसे अधिकतम क्क्त्आजीवन कारावास या तीन साल की सजा हो सकती है.
वहीं, इस कानून के दायरे में स्वस्थ आलोचना नहीं आती।
धारा के दुरुपयोग को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दिया है आदेश
इस धारा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कुछ फैसले सुनाए हैं और उससे साफ होता है कि कोई भी हरकत या सरकार की आलोचनाभर से देशद्रोह का मामला नहीं बनता, बल्कि उस विद्रोह के कारण हिंसा और कानून और व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो जाए तभी देशद्रोह का मामला बनता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में राजद्रोह की कुछ ऐसी व्याख्या की है। 1962 में केदारनाथ बनाम बिहार राज्य के केस में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया और सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फेडरल कोर्ट ऑफ (ब्रिटिश) इंडिया से सहमति जताई थी। सुप्रीम कोर्ट ने केदारनाथ केस में व्यवस्था दी कि सरकार की आलोचना या फिर प्रशासन पर टिप्पणी भर से देशद्रोह का मुकदमा नहीं बनता।
सुप्रीम कोर्ट ने धारा-124 ए के दायरे को सीमित करते हुए कहा था कि वैसा ऐक्ट जिसमें अव्यवस्था फैलाने या फिर कानून व व्यवस्था में गड़बड़ी पैदा करने या फिर हिंसा को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति या फिर मंशा हो तभी देशद्रोह का मामला दर्ज हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संवैधानिक बेंच ने अपने आदेश में कहा था कि देशद्रोह के मामले में हिंसा को बढ़ावा देने का तत्व मौजूद होना चाहिए। महज नारेबाजी राजद्रोह नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य के मामले में कहा था कि महज नारेबाजी किए जाने से राजद्रोह का मामला नहीं बनता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक-दो बार कुछ लोगों द्वारा कुछ नारेबाजी किए जाने पर राजद्रोह का मामला नहीं बनाता। सरकारी नौकरी करने वाले दो लोगों ने देश के खिलाफ नारेबाजी की थी और तब पंजाब में चल रहे खालिस्तान की मांग के पक्ष में नारे लगाए थे। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि दो लोगों द्वारा बिना कुछ और किए दो बार नारेबाजी किए जाने से देश को किसी प्रकार के खतरे का मामला नहीं बनता।
कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसी हरकत जिससे कि देश और समुदाय के खिलाफ विद्रोह और नफरत पैदा हो तभी देशद्रोह का मामला बनेगा।
कानून के जानकारों का कहना है कि देशद्रोह की परिभाषा काफी व्यापक है और इस कारण इसके दुरुपयोग की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए सीआरपीसी की धारा-196 में प्रावधान किया गया कि देशद्रोह से संबंधित मामले में दर्ज मामले में पुलिस को चार्जशीट के वक्त मुकदमा चलाने के लिए केंद्र अथवा राज्य सरकार से संबंधित प्राधिकरण से मंजूरी लेना जरूरी है।
124 A. Sedition.
1*[124A. Sedition.–Whoever by words, either spoken or written,
or by signs, or by visible representation, or otherwise, brings or
attempts to bring into hatred or contempt, or excites or attempts to
excite disaffection towards, 2***the Government established by law in
3*[India], a 4***shall be punished with 5*[imprisonment for life], to
which fine may be added, or with imprisonment which may extend to
three years, to which fine may be added, or with fine.
Explanation 1.-The expression “disaffection” includes disloyalty
and all feelings of enmity.
Explanation 2.-Comments expressing disapprobation of the measures
of the Government with a view to obtain their alteration by lawful
means, without exciting or attempting to excite hatred, contempt or
disaffection, do not constitute an offence under this section.
Explanation 3.-Comments expressing disapprobation of the
administrative or other action of the Government without exciting or
attempting to excite hatred, contempt or disaffection, do not
constitute an offence under this section.]
जानें कि कानून का इतिहास , हमारी अदालतों में इससे जुड़े कितने मामले लंबित हैं
देशद्रोह पर कोई भी कानून 1859 तक नहीं था. इसे 1860 में बनाया गया और फिर 1870 में इसे आईपीसी में शामिल कर दिया गया.
इन पर हुआ है लागू:
1. 1870 में बने इस कानून का इस्तेमाल ब्रिटिश सरकार ने महात्मा गांधी के खिलाफ वीकली जनरल में ‘यंग इंडिया’ नाम से आर्टिकल लिखे जाने की वजह से किया था. यह लेख ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लिखा गया था.
2. बिहार के रहने वाले केदारनाथ सिंह पर 1962 में राज्य सरकार ने एक भाषण के मामले में देशद्रोह के मामले में केस दर्ज किया था, जिस पर हाई कोर्ट ने रोक लगा दी थी. केदारनाथ सिंह के केस पर सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की एक बेंच ने भी आदेश दिया था. इस आदेश में कहा गया था, ‘देशद्रोही भाषणों और अभिव्यक्ति को सिर्फ तभी दंडित किया जा सकता है, जब उसकी वजह से किसी तरह की हिंसा, असंतोष या फिर सामाजिक असंतुष्टिकरण बढ़े.’
3. 2010 को बिनायक सेन पर नक्सल विचारधारा फैलाने का आरोप लगाते हुए उन पर इस केस के तहत मुकदमा दर्ज किया गया. बिनायक के अलावा नारायण सान्याल और कोलकाता के बिजनेसमैन पीयूष गुहा को भी देशद्रोह का दोषी पाया गया था. इन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी लेकिन बिनायक सेन को 16 अप्रैल 2011 को सुप्रीम कोर्ट की ओर से जमानत मिल गई थी.
4. 2012 में काटूर्निस्ट असीम त्रिवेदी को उनकी साइट पर संविधान से जुड़ी भद्दी और गंदी तस्वीरें पोस्ट करने की वजह से इस कानून के तहत गिरफ्तार किया गया. यह कार्टून उन्होंने मुंबई में 2011 में भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए गए एक आंदोलन के समय बनाए थे.
5. 2012 में तमिलनाडु सरकार ने कुडनकुलम परमाणु प्लांट का विरोध करने वाले 7 हजार ग्रामीणों पर देशद्रोह की धाराएं लगाईं थी.
6. जेएनयू के स्टूडेंट लीडर कन्हैया कुमार को पुलिस ने देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया. उन पर आईपीसी की धारा 124A के तहत केस दर्ज किया गया.
7. 2015 में हार्दिक पटेल कन्हैया कुमार से पहले गुजरात में पाटीदारों के लिए आरक्षण की मांग करने वाले हार्दिक पटेल को गुजरात पुलिस की ओर से देशद्रोह के मामले तहत गिरफ्तार किया गया था.























