देश की राजनीति में बड़े पैमाने पर कारपोरेट घरानों के भ्रष्ट रूप से आता अवैध पैसा कोई छुपी सच्चाई नहीं हे.सहारा और आदित्य बिड़ला समूह की ओर से राजनीतिकों को पैसा दिए जाने से जुड़ी फाइलों की जांच सुप्रीम कोर्ट ने अनावश्यक करार देते हुए रोक भले ही दी हो, लेकिन इस प्रकरण पर से संदेह के बादल जल्द ही नहीं छंटने वाले। ये दस्तावेज सहारा समूह पर छापे के दौरान जब्त किए गए थे। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत की राजनीति में बड़े पैमाने पर कारपोरेट घरानों से अवैध रूप से पैसा आता है।
2013 में सीबीआई ने हिंडाल्को, एबीजी कंपनी, कंपनी पर छापा मार कर सीईओ के कंप्यूटर से जो दस्तावेज बरामद किए थे, उनमें लिखा था- ‘गुजरात सीएम- 25 करोड़ रुपए। 12 दे दिए। 13?’ फिर दूसरा छापा नवंबर 2014 में नोएडा में सहारा समूह के दफ्तर पर पड़ा। उसमें जो कंप्यूटर आंकड़े मिले उनमें 115 करोड़ रुपए राजनेताओं को देने की बात सामने आई। इन कंपनियों ने इस तरह के लेनदेन की जांच दिखा कर जो कोशिशें कीं, वो एकदम हास्यास्पद थीं। हिंडाल्को के सीईओ ने जांचकर्ताओं को पूछताछ में बताया कि ‘गुजरात सीएम’ से उनका तात्पर्य ‘गुजरात एल्कलीज एंड केमिकल्स’ से था। तो फिर इसमें ‘सी’ और ‘एम’ का क्या मतलब है? अधिकारियों के पास इसका कोई जवाब नहीं था।
हालांकि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इन दस्तावेजों को ‘बहुत ही कम सबूतों वाला’ पाया, जिनमें ठोस रूप से पुष्टि करने वाले कोई सबूत नहीं थे। भारतीय राजनेताओं के संदर्भ में यह उम्मीद करना कितना तर्कसंगत है कि राजनेता अवैध रूप से पैसा लेते होंगे और हस्ताक्षर वाली रसीद जारी करें। ना ही आरोपित भुगतान उनकी संपत्ति में कहीं दिखाया जाता होगा। और अगर ऐसा हुआ भी हो, तो जांचकर्ताओं के लिए तो यह काफी आसान होगा कि वे वीआईपी अकाउंट बुक तक आसानी से पहुंच जाएं।
दूसरी ओर 1990 के जैन हवाला कांड के बाद जांचकर्ताओं के लिए इस बात का रास्ता साफ हो गया कि प्राप्ति के सबूतों के बिना भी वे जांच करने का काम जारी रख सकते हैं। जैन हवाला कांड में अदालत ने सीबीआई को यह ‘परमादेश’ जारी किया था कि वह मामले की सुनवाई के लिए सबूत जुटाए। यह अलग बात है कि यह न्यायपालिका पर एक धब्बा थी, क्योंकि हर चीज सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के मुताबिक चल रही थी और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने ही इसे कूड़ेदान के हवाले कर दिया था।
इससे भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि इस तरह के संदेहास्पद भुगतानों में जांच अस्वीकार्यता के आधार पर बंद कर दी जाती है, जैसे कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल सरकार के खिलाफ सरकार का केस कमजोर पड़ गया। तृणमूल सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय और तपस पाल सीबीआई की हिरासत में थे और अब न्यायिक हिरासत में बंद हैं। ये दोनों कुल मिला कर इसलिए हिरासत में बंद हैं क्योंकि रोजवैली कॉरपोरशन, के मालिक गौतम कुंडू के दस्तावेजों में संकेतों में लिखे इनके नाम मिले थे। रोजवैली कॉरपोरेशन सहारा की तरह ही एक पोंजी स्कीम फर्म है जिसने लोगों को मोटे रिटर्न का लालच देकर 20 हजार करोड़ जुटा लिए थे। इन सासंदों पर मुकदमा चलाने के लिए जब तक पर्याप्त सबूत नहीं मिल जाते, तो इससे न सिर्फ सीबीआई का केस कमजोर पड़ेगा, बल्कि इससे तृणमूल प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आरोपों को भी मजबूती मिलेगी। ये ममता बनर्जी ही थीं जिन्होंने आरोप लगाया था कि उनकी पार्टी को सिर्फ इसलिए प्रताड़ित किया जा रहा है क्योंकि उन्होंने ही सबसे पहले नरेंद्र मोदी सरकार के 500 और 1000 रुपए नोट बंद करने के फैसले का खुल कर विरोध किया था।
यह स्वाभाविक ही है कि चुनाव जीतने वाले ‘बड़े भारतीय ठगों’ और कारपोरेट पैसे से राजनीतिक ताकत बढ़ाने और एक शताब्दी पहले के जालसाज चार्ल्स पोंजी के आधुनिक अवतारों द्वारा आम लोगों से ऐंठे गए पैसे से ताकत बढ़ाना आसान काम नहीं है। यह जनप्रतिनिध्व कानून की धारा (29 सी) से जुड़ा मसला है जो कि 20 हजार रुपए तक दान देने वाले को नाम गुप्त रखने की इजाजत देता है। यह पता लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है कि 70 से 80 फीसद लोग जो राजनीतिक दलों को दान देते हैं वह या तो उद्योग घरानों का कर चोरी का पैसा होता है या फिर योजनाओं का प्रलोभन देकर आम लोगों की जेब से निकाला गया उनकी गाढ़ी कमाई का पैसा।
चुनाव कानूनों को और कारगर बना कर इस बुराई से निपटा नहीं जा सकता है? राजनीतिक दलों को द्ए जाने वाले गुप्त या बेनामी चंदे की सीमा 20 हजार रुपए से घटाकर दो हजार रुपए करने के प्रस्ताव को प्रधानमंत्री मौखिक रूप से कई बार अपना समर्थन दे चुके हैं। दूसरी ओर नियम बदलने के लिए कई ऐसे सुझाव भी आए हैं जिनमें सभी राजनीतिक दलों को अपना चंदा दिखाना अनिवार्य करने को कहा जाए जैसे कि ज्यादातर पश्चिमी लोकतंत्रों में होता है। राजनीतिक व्यवस्था में स्वच्छता की यह एक अच्छी शुरुआत हो सकती है। लेकिन क्या इतना भर पर्याप्त होगा?
स्थानीयता या सांस्कृतिक विभिन्नता की बात न करें तो, देश के आकार की वजह से भारत में चुनावी राजनीति हमेशा से काफी महंगी रही है। पिछले कुछ दशकों में यह देखा गया है मुश्किल से ही चुनावी अभियान की लागत में कोई फर्क आया हो। दूसरी ओर इसमें दबाव समूहों को बनाए रखने के लिए फुसलाने की जरूरत बनी रहती है। इसके अलावा जातीय नेताओं या वंश प्रमुखों को खुश रखना पड़ता है। साथ ही चुनाव में नौकरशाहों को पटा कर रखना होता है। चुनाव के दिन ‘दोस्ताना’ पुलिस प्रमुख या ‘अनुकूल’ मजिस्ट्रेट हजारों कार्यकर्ताओं के बराबर की पूंजी होता है।
जाहिर है कि इतने विशालकाय अभियान के लिए ‘अज्ञात शुभचिंतकों’ से जो पैसा आता है, उसके स्रोत का खुलासा नहीं किया जा सकता। न ही सिर्फ कारपोरेट घराने इसका खर्च ढो सकते हैं, जो कि कालेधन के सबसे प्रमुख स्रोत के रूप में देखे जाते हैं। ज्यादा या कम बिल बना कर कर चोरी करना अब पूरी दुनिया में मुश्किल होता जा रहा है। इसलिए अब भविष्य में राजनीतिक दलों को होने वाली फडिंग सहारा, रोजवैली और टीएमसी पार्टी पर कार्रवाई से ही रुकेगी। सारधा और रोजवैली मामलों की जांच से पता चला कि इनके तार तो हरियाणा, ओड़ीशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, असम और झारखंड तक में फैले हैं। आम भारतीय में बचत करने प्रवृत्ति भीतर से बहुत गहरी है, प उसके पास विकल्प बहुत ही सीमित हैं। बैंक तो बहुत ही कम हैं, इस बात का पता तो विमौद्रीकरण अभियान के दौरान चला। पूरे देश में आम नागरिक बचत के लिए तो ठगों पर ही निर्भर हो गया है और जैसे तो बैंक उसके लिए हैं ही नहीं। इसलिए ठगों को पैसे के लिए आम आदमी और अपने बचाव के लिए राजनेताओं की दरकार है।























