नईदिल्ली. दिल्ली उच्च न्यायालय ने ब्रिटेन आधारित वेदांता रिसोर्सेज की सहयोगी कंपनियों से मिले चंदा को कानून के विरुद्ध करार देते हुए अधिकारियों को कांग्रेस और भाजपा के खिलाफ कार्रवाई करने का शुक्रवार को निर्देश दिया।
न्यायमूर्ति प्रदीप नंदराजोग और न्यायमूर्ति जयंत नाथ की खंडपीठ ने अधिकारियों को छह महीने के अंदर दोनों राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ उचित कार्रवाई करने का निर्देश दिया। उच्च न्यायालय ने यह आदेश गैर सरकारी संगठन ऐसोसिएशन फॉर डेमोक्रैटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की जनहित याचिका पर सुनाया। एडीआर ने जनहित याचिका में आरोप लगाया कि गृह मंत्रालय ने अपने जवाब में तथ्यगत रूप से स्वीकार किया कि इन पार्टियों को वित्तपोषण वेदांता से आया है।
अदालत ने एडीआर, केन्द्र और कांग्रस एवं भाजपा की दलीलें सुनने के बाद 28 फरवरी को अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था।उच्च न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि वेदांता कंपनी अधिनियम 1956 के तहत एक विदेशी कंपनी है और विदेशी योगदान (नियमन) अधिनियम, 1976 के तहत वेदांता और इसकी सहायक कंपनियां विदेशी स्रोत हैं.पीठ ने कहा, “प्रथम दृष्टया कांग्रेस और बीजेपी ने कानून के दायरे में विदेशी स्रोत माने जाने वाले स्टरलाइट और सेसा से चंदा स्वीकार कर विदेशी योगदान (नियमन) अधिनियम का प्रत्यक्ष उल्लंघन किया है.”
भारत सरकार के पूर्व सचिव ईएएस शर्मा ने भी जनहित याचिका दायर कर कहा था कि प्रमुख राजनीतिक दल, कारपोरेट समूह और पीएसयू विदेशी चंदा एवं अन्य कानूनों का उल्लंघन कर रहे हैं और अदालती निगरानी में विशेष जांच दल (एसआईटी) या केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से इसकी जांच होनी चाहिए।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि कांग्रेस और भाजपा ने सरकारी कंपनियों तथा विदेशी स्रोतों से चंदा ले कर जनप्रतिनिधित्व अधिनियम एवं विदेशी चंदा (विनियमन) अधिनियम का उल्लंघन किया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि वेदांता रिसोर्सेज और स्टरलाइट इंडस्ट्रीज, सेसा गोवा एवं माल्को समेत भारत में उसकी अनुषंगी कंपनियों ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भाजपा जैसी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों को करोड़ों रुपये चंदे में दिए हैं।
याचिकाकर्ता का कहना है कि वेदांता की 2012 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार भारतीय आम चुनाव के संबंध में उसने किसी ट्रस्ट के माध्यम से या सीधे ही तकरीबन 20.10 लाख डालर का राजनीतिक चंदा दिया है। केन्द्र की तरफ से पेश अतिरिक्त सालिसिटर जनरल एल नागेश्वर राव ने गैर सरकारी संगठन की याचिका का यह कर विरोध किया था कि चंदा भारत में सूचीबद्ध कंपनियों से आए और इन कंपनियों के यहां संचालन हैं।
कांग्रेस और भाजपा दोनों ने इसी तरह का रूख अपनाया था। उनका कहना था कि उन्होंने किसी कानून का उल्लंघन नहीं किया है क्योंकि विदेशी कंपनी में एक भारतीय का बहुमत शेयर है जिसकी भारतीय अनुषंगी कंपनियों ने उन्हें चंदा दिया। एडीआर के वकील प्रशांत भूषण ने कांग्रेस और भाजपा दोनों की दलीलों का विरोध किया।






















