नईदिल्ली.उच्चतम न्यायालय ने आज मुजफ्फरनगर और उसके आसपास के क्षेत्रों में साम्प्रदायिक हिंसा को रोकने में लापरवाही के लिए अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली उत्तरप्रदेश सरकार को प्रथम दृष्टया जिम्मेदार ठहराया, लेकिन सीबीआई या एसआईटी को मामलों की जांच का निर्देश देने से इनकार किया।
उच्चतम न्यायालय में प्रधान न्यायाधीश पी सदाशिवम के नेतत्व वाली पीठ ने इन मामलों की ठीक ढंग से जांच और साम्प्रदायिक संघर्ष के पीड़ितों के पुनर्वास के लिए कई निर्देश दिये। शीर्ष अदालत ने कहा कि हम प्रथम दृष्टया राज्य सरकार को ऐसी घटनाओं को रोकने में लापरवाही के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं।
अदालत ने कहा कि राज्य सरकार उपयुक्त कदम उठा रही है और विभिन्न मामलों की जांच के लिए विशेष जांच प्रकोष्ठ का गठन किया है और इस समय में सीबीआई या एसआईटी को जांच के लिए निर्देश देने की जरूरत नहीं है।
उच्चतम न्यायालय ने राज्य प्रशासन को सभी आरोपियों पर मुकदमा चलाने का निर्देश दिया चाहे वे किसी भी राजनीतिक पार्टी से संबद्ध क्यों न हों। शीर्ष अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि राज्य सरकार पीडिम्तों और उनके परिवार के सदस्यों को सुनवाई पूरी होने तक सुरक्षा प्रदान करे।
पीठ ने दंगा पीड़ितों समेत कई लोगों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया, जिसमें राज्य सरकार को मामलों की जांच ठीक ढंग से करने और सीबीआई जांच का निर्देश देने की मांग की गई थी। याचिकाओं में केंद्र और उत्तरप्रदेश सरकार को यह निर्देश देने की मांग की गई है कि वे राज्य में हुए साम्प्रदायिक हिंसा के कारणों का पता लगाए।
जनहित याचिका में यह मांग भी की गई है कि प्रभावित लोगों का ठीक ढंग से पुनर्वास किया जाए और हिंसा के जिम्मेदार लोगों पर मुकदमा चलाया जाए। गौरतलब है कि मुजफ्फरनगर और आसपास के क्षेत्रों में पिछले वर्ष सात सितंबर को सम्प्रदायिक हिंसा हुई थी जिसमें 40 लोग मारे गए थे, 85 घायल हो गए थे और करीब 51 हजार लोगों को घरबार छोड़ना पड़ा था, जिसमें से अधिकतर मुसलमान थे। जनहित याचिका मोहम्मद हारून और अन्य ने उच्चतम न्यायालय में दायर की थी।





















