मंथन . सुप्रीम कोर्ट के बुधवार के फैसले से समलैंगिक समुदाय के चेहरे पर उदासी छा गई। पिछले चार सालों से समलैंगिकों के अधिकारों की जीत का जश्न मना रहे लोगों के लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला तगड़ा झटका साबित हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के 2009 के फैसले को रद्द कर दिया है। यानी अब भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत दो बालिगों के बीच बनने वाले समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध माना जाएगा। इससे पहले हाईकोर्ट ने धारा 377 को अपराध की श्रेणी से हटा दिया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को समलैंगिक समुदाय निजता के अधिकार का हनन बता रहा है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में माना था कि जनता का मौलिक अधिकार किसी दूसरे कानून का बंधक नहीं हो सकता। संविधान में हर व्यक्ति को अपने तरीके से जीने की आजादी है। समाज भले ही समलैंगिकों को अलग समुदाय समझता हो, लेकिन इससे उनके मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता। इसलिए एकांत में दो बालिग लोगों के बीच बनने वाला समलैंगिक यौन संबंध अपराध की श्रेणी में नहीं आ सकता। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 को सही मानते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को असंवैधानिक करार दिया है।
सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि आईपीसी की धारा को कोर्ट निरस्त नहीं कर सकता। अगर कानून में कोई बदलाव करना है तो ये काम संसद को करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद समलैंगिक संबंध बनाने पर उम्र कैद तक की सजा हो सकती है।सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने भी समलैंगिक समुदाय के पक्ष में बहस की थी। लिहाजा इस फैसले से सरकार भी सहमत नजर नहीं आ रही है। हालांकि देश के अधिकांश धार्मिक सामाजिक संगठन सुप्रीम कोर्ट के फैसले से खुश हैं। उन्होंने इसे समाज की संस्कृति को बचाने वाला सही फैसला बताया है। सही भी हे कि क्या हर व्यक्ति को अपने मनचाहे अप्राकृतिक और असामाजिक तरीके से जीने की आजादी देना हमारे बड़े भारी 125 करोड़ की जनसँख्या वाले देश में अराजकता को तेजी से नहीं फेलायेगा इस पर भी गहन मंथन कर ही कोई निर्णय लेना ठीक होगा तब तक सुप्रीम कोर्ट के इस फेंसले को मानव अधिकार की कटोती के रूप में नहीं सामाजिक व्यवस्था की दृष्टि से ही देखना ठीक होगा.






















