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नई दिल्ली। अपने क्षेत्र में स्वयं को मिली करारी हार के बाद कांग्रेस नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी खीज कर मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह पर हार का ठीकरा फोड़ने की कोशिश करते नजर आये, के आरोपों के परिप्रेक्ष्य में प्रदेश को देखे :
बुंदेलखंड के पांच जिलो की छब्बीस सीटो से बीजेपी के 20 और कांग्रेस के 6 जीते अर्थात बीजेपी को 75% सीटो पर जीत ,गौरतलब है कि सत्यव्रत चतुर्वेदी अपने क्षेत्र से खुद के पुत्र को भी नहीं जिता पाए न ही क्षेत्र में किसी समर्थक को ही जिता पाए.
कमलनाथ के प्रभाव वाले महाकोशल में 8 जिले की 38 सीटो पर बीजेपी को 24 कांग्रेस को 13 सीट मिली अर्थात बीजेपी 63% जीती, कमलनाथ के छिन्द्वाडा संसदीय क्षेत्र से केवल तीन सीट कांग्रेस जीती ,
अब अच्छी छवि वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रचार अभियान की कमान सौंपने से कांग्रेस को क्या कुछ हांसिल हुआ, चम्बल ग्वालियर के 8 जिलो की 34 सीटो में बीजेपी को 20 और कांग्रेस को 12 सीट मिली अर्थात बीजेपी को 60% सीट मिली,
अजय सिंह के प्रभाव वाले विन्ध्य के 7 जिलो की 30 में से बीजेपी को 16 सीटे ही मिली अर्थात 50%,
भोपाल और नर्मदा के 8 जिलो की 36 सीटो पर बीजेपी को 29 सीट अर्थात 80% सीट मिली जहा की पचोरी जेसे नेता बीस हजार वोटो से हार गए,पचोरी की बुरी तरह हार से भी इन जेसे केंद्र के बड़े बड़े पदों पर बेठे ड्राइंगरूम राजनीतिज्ञो की असलियत भी स्पस्ट हो गयी .
मालवा निमाड़ के 16 जिलो की 66 सीटो में से बीजेपी को 56, कांग्रेस को 9 सीट मिली अर्थात बीजेपी को 85% सीट मिली, कांग्रेस के बुरी तरह जमानत जप्त हारे हुओ में महिदपुर से कमलनाथ समर्थक कल्पना परुलेकर और जावद से ज्योतिरादित्य के समर्थक रघुराज चोरडिया हे ये दोनों तीसरे स्थान पर रहे.
उपरोक्तानुसार से स्पस्ट हे की आदिवासी नेता कांतिलाल भूरिया को पीसीसी हेड बनाकार कांग्रेस ने आदिवासी निमाड़ में जो रणनीतिक अग्रता प्राप्त कर भी ली थी उसे ज्योतिरादित्य को सीएम प्रोजेक्ट कर शायद खो तो दिया ही, दूसरी और चम्बल ग्वालियर क्षेत्र में स्वच्छ छवि वाले ज्योतिरादित्य कोई उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं दिला पाए, सिंधिया को एक वर्ष पहले ही दिग्गी जेसे कुर्सी छोड़कर जमीनी संघर्ष करना चाहिए था , हो सकता हे कि वे केन्द्रीय मंत्री का पद छोड़ने का जोखिम नहीं उठा पा रहे हो लेकिन इससे जनता में पहले ही नेत्रत्व के खुद पर ही अविश्वास और कमजोरी का सन्देश चला गया, अखिलेश यादव को यूपी में एक वर्ष पहले से लगातार चुनावी संघर्ष से जो लाभ मिला उसे ये कांग्रेस नेता अपनी परंपरागत शेली में एक दो हफ्ते के हवाई दोरे से प्राप्त कर लेना चाहते हो किन्तु शिवराज के लगातार जीवंत जनसंपर्क के आगे ये असफल हो गए,
कमलनाथ द्वारा टिकट दिलाये समर्थक परुलेकर की तो जमानत ही जप्त हो गई , उनके द्वारा पोषित रहे जावद से खड़े बागी ने बीजेपी को जिताने में अहम् भूमिका अदा की,
इन विषम परिस्थिति में भी दिग्गी ने अपने पुत्र को साठ हजार मतों से जिताकर सिद्द कर दिया की उनके अपने क्षेत्र के मतदाताओ से जीवंत आत्मिक विश्वास के रिश्ते हे जिस पर कोई भी शिवराज सुनामी असर नहीं डाल सकती,
लोगो का कहना तो यह भी हे कि बीजेपी के विरुद्ध भारी एंटी इनकम्बेंसी भांप दिल्ली दरबार के चहेते जनाधारविहीन नेता सीएम बनने के मुगालते में आ गए थे, और संघ और बीजेपी से लगातार अकेले लोहा लेने वाले दिग्गी को टिकट वितरण में ही किनारे लगा दिया, जिसपर की दिग्गी को कहना पड़ा था कि वो तो डूबते सूरज हे, अपने किसी भी समर्थको को भी कोई टिकट नहीं दिला सकने के बावजूद भी दिग्गी बीजेपी संघ से अकेले ही लड़ते रहे,
कुल मिलाकर टीवी परिचर्चा में माहिर सत्यव्रत चतुर्वेदी जो की अच्छे वक्ता तो हे लेकिन वो और उनका गुट दिग्विजय जेसा जनाधार वाला नहीं हे, की बातों से ऐसा लगता है की वो लोकसभा चुनाव में तो खड़े हो ही नहीं सकते संभावित हार की जिम्मेदारी से भी बचने के लिए पहले ही अपने को उस संघर्ष से दूर कर लेना चाहते हे, लगता यह भी हे कि अब जब ड्राइंगरूम राजनीति के महारथियो को राज्यसभा सीट मिलने के लाले पड़ने की स्थिति आने वाली हे, तो इनकी नींद टूटी खुद को चारो खाने चित्त पाया , तो ये महानुभाव अपनी हार का ठीकरा कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर भी फोड़ना चाहते हे, उनके अनुसार आलाकमान के सामने केवल चापलूसों की बातें सुनी जाती हैं .
कांग्रेस को चाहिये की वो हकीकत को जल्द पहचाने,राहुल गाँधी के द्वारा कराये गये वास्तविक जमीनी सर्वे और तय मापदंडो को किन किन नेताओ ने किन कारणों से तोडा , कांग्रेस की जमानत जप्त कराने वालो को टिकट दिए की स्पस्ट जांच कर कार्यकर्ताओ के संगठन के हित में खुलासा करे , ऐसे हवाई नेताओ को जो मप्र केवल चुनाव के समय प्रजा को दर्शन देकर अहसान करने आते हो को किनारे लगाये और आधारभूत कार्यकर्ताओ से सीधे संवाद कर एक एक सीट की हार जीत का बारीकी से विश्लेषण कर निष्प्राण संगठन में प्राण फूंकने के लिए खुद जहमत उठाये नहीं तो मोदी गांधीजी की कथित अंतिम इच्छा जरूर पूरी कर देंगे.





















