नई दिल्ली : मेजर ध्यानचंद से पहले क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न दिये जाने से पैदा हुए विवाद के बीच इस महान हॉकी खिलाड़ी के बेटे और 1975 विश्व कप विजेता टीम के सदस्य रहे अशोक कुमार ने आज कहा कि अगर वह खेल से जुड़े नहीं होते तो ध्यानचंद का नाम इस देश से मिट जाता, ‘ध्यानचंद के नाम पर हम सिर्फ खेल दिवस मनाते हैं लेकिन नई पीढ़ी को उनकी उपलब्धियों से अवगत कराने के लिये कोई पहल नहीं की गई।‘सभी देशवासी आहत । एक बार फिर ग्लैमर से भरे एक खेल ने जमीन से जुड़ी हॉकी को ठग लिया। ध्यानचंद को भारत रत्न नहीं देना उनके साथ नहीं बल्कि पूरे देश के साथ छलावा है। तेंदुलकर को पुरस्कार मिलने से हमें कोई गिला नहीं लेकिन संयुक्त रूप से भी दिया जा सकता था।’
खुद भी महान स्टार खिलाडी रहे अशोककुमार ने ध्यानचंद के नाम पर कई पुरस्कार होने का तर्क देने वाले केंद्रीय मंत्री राजीव शुक्ला को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि उन्हें इस तरह का बयान देने की जरूरत नहीं थी,‘यह बहुत ओछा बयान है। उन्हें इस तरह से नहीं बोलना चाहिए था। ध्यानचंद ने अपने जीवन के सुनहरे साल हाकी को दे दिये। उनके परिवार ने देश को 13 पदक (छह ओलंपिक, तीन विश्व कप और चार एशियाड) दिये। इससे अधिक क्या कर सकते थे। ये रिकार्ड नहीं बल्कि उपलब्धियां हैं लेकिन उस महान खिलाड़ी को देश में वह मुकाम नहीं मिला जिसके वह हकदार थे।’अशोक ने कहा कि ध्यानचंद ने ताउम्र जिन हालात का सामना किया, अगर वे उसके किस्से सुनाने लगे तो लोगों के आंसू निकल आएंगे। उन्होंने कहा, ‘उन्हें आखिरी बार 1956 में पद्मविभूषण मिला था। आखिरी समय उन्होंने मुफलिसी और इलाज के अभाव में गुजारा। सेना से बस 400 रुपये पेंशन मिलती थी और तब सरकार ने उनकी सुध नहीं ली।’
ध्यानचंद भारत रत्न से ऊपर थे और रहेंगे उन्हें सम्मान की नहीं, देश को उनका सम्मान करने की जरुरत थी , अशोककुमार ही नहीं प्रत्येक देशवासी दुखी और हतप्रभ हे.






















