हॉकी खिलाड़ी ध्यानचंद का नाम अपने आप में ही एक युग का बखान करना है तो मिल्खा सिंह भी भारत का गौरव हैं। सचिन को भारत रत्न मिला तो इन्हें भी यह पुरस्कार देने की बात उठने लगी है।
हॉकी के जादूगर ध्यानचंद ने नंगे पांव हिटलर के देश को हराया,किसी सरकार उनकी सुध नहीं ली अब सभी उनकी याद कर भारतरत्न देने की मांग कर रहे हे , जिस घटना ने ध्यानचंद को विश्व प्रसिद्धि दिलाई बो ये था की बर्लिन ओलम्पिक फाइनल में हिटलर की मौजूदगी से ही भारतीय टीम सहमी हुई थी. ड्रेसिंग रुम में सहमी टीम के सामने टीम के मैनेजर पंकज गुप्ता ने गुलाम भारत में आजादी का संघर्ष करते कांग्रेस के तिरंगे को अपने बैग से निकाला और ध्यानचंद समेत हर खिलाडी को उस वक्त तिंरगे की कसम खिलाई कि हिटलर की मौजूदगी में घबराना नहीं है. यह कल्पना के परे था. लेकिन सच था कि आजादी से पहले जिस भारत को अंग्रेजों से मु्क्ति के बाद राष्ट्रीय ध्वज तो दूर संघर्ष के किसी प्रतीक की जानकरी पूरी दुनिया को नहीं थी और संघर्ष देश के बाहर गया नहीं था, उस वक्त भारतीय हॉकी टीम ने तिरंगे को दिल में लहराया .
जर्मनी की टीम के खिलाफ मैदान में उतरी टीम ने खेलना शुरु किया और गोलों का सिलसिला भी फौरन शुरू हो गया. हाफ टाइम तक भारत 2 गोल ठोंक चुका था. 14 अगस्त को बारिश हुई थी तो मैदान गीला था और बिना स्पाइक वाले रबड़ के जूते लगातार फिसल रहे थे. ध्यानचंद ने हाफ टाइम के बाद जूते उतार कर नंगे पांव ही खेलना शुरु किया. जर्मनी को हारता देख हिटलर मैदान छोड़ जा चुका था. उधर नंगे पांव खेलते ध्यानचंद ने हाफ टाइम के बाद गोल दागने की रफ्तार बढ़ा दी थी. इस मैच में भारत ने 8-1 से जर्मनी को हराया.
फाइनल के अगले दिन यानी 16 अगस्त को ऐलान हुआ कि विजेता भारतीय टीम को मेडल पहनाएंगे हिटलर.इस खबर को सुनकर ध्यानचंद रात भर नहीं सो पाए.भारत में जैसे ही ये खबर पहुंची यहां के अखबार हिटलर के अजीबोगरीब फैसलों के बारे में छाप कर आशंका का इंतजार करने लगे.बहरहाल, अगले दिन हिटलर आए और उन्होंने ध्यानचंद की पीठ ठोंकी.उनकी नजर ध्यानचंद के अंगूठे के पास फटे जूतों पर टिक गई.ध्यानचंद से सवाल जवाब शुरू हुआ. जब हिटलर को पता चला कि ध्यानचंद ब्रिटिश इंडियन आर्मी की पंजाब रेजिमेंट में लांस नायक जैसे छोटे ओहदे पर है, तो उसने ऑफर किया कि जर्मनी में रुक जाओ, सेना में कर्नल बना दूंगा. ध्यानचंद ने कहा, नहीं पंजाब रेजिमेंट पर मुझे गर्व है और भारत ही मेरा देश है.हिटलर ध्यानचंद को मेडल पहनाकर स्टेडियम से चले गए.






















