नव रसों में से एक रस है, श्रृंगार जो सिर्फ सौंदर्य और प्रेम का आख्यान भर नहीं है। सच तो यह है कि संतों का भी श्रृंगार से गहरा संबंध है और उनका यह श्रृंगारिक स्वरूप सिंहस्थ में उभरा है। साधुओं के श्रृंगार के तीन साधन है- चंदन, भस्म और रूद्राक्ष, जिनके विभिन्न आकार प्रकार दिखाई दे रहे है। चार रंग और इक्कीस मुख के ग्यारह सौ रूद्राक्षों को धारण करने वाले संत तो दिखाई नहीं दिए, लेकिन भस्म, त्रिपुंड व रूद्राक्ष की महिमा जरूर दिखाई दे रही है।
साधुओं के श्रृंगार के साधन अनेक है पर साध्य सिर्फ एक है ध्यान और तप। यह बात अलग है कि आधुनिक जीवन में श्रृंगार प्रेम और सौंदर्य की विशुद्ध उपासना का साधन बनाकर ही रह गया है और उसमें भी सफलता कम, फरेब की संभावना अधिक रहती है। लेकिन साधुओं के श्रृंगार की परिभाषा बिल्कुल अलग है। ये अपनी रूप सज्जा और साधना से आध्यात्म को पाते है। सिंहस्थ में संतो के श्रृंगार के विविध रूप सामने आए और इस बहाने वेदों एवं उपनिषदों की चंदन, भस्म व रूद्राक्ष संबंधी अवधारणा उभर कर सामने आई।
चंदन की सिद्ध लकडि़यां, त्रिपुंड, भस्म और भार रंग व चौदह मुख का रूद्राक्ष तो इस संत समागम में दिखाई नहीं दिया, मगर क्या यह जानना कम दिलचस्प न होगा कि संत सज्जा प्रदर्शन नहीं, मोक्ष के लिये है? सिंहस्थ में कोई भी साधु श्रृंगार विहीन दिखाई नहीं दिया। कोई रामानंदी तिलक लगाए तो कोई शिवमार्गी शैली में सज्जित। रामादल के बैरागी लंबी लकीर के रूप में नाक से सिर तक लंबा तिलक लगाते, जबकि शिवदल के सन्यासी माथे पर आड़ी रेखाओं में लेप करते। वैष्णव धर्म के चारों संप्रदायों में तिलक और भस्म का महत्व है और साथ ही चंदन व तुलसी की महिमा भी कम नहीं। वैष्णव संप्रदाय के संत यहां तक कहते है कि वैष्णवधर्मी के लिये तो तुलसी धारण करना अनिवार्य है।
साधुओं का श्रृंगार कई तरह से होता है, कोई चंदन का लेप करता है तो किसी को भस्म लगाने में रूचि है। किसी ने रूद्राक्ष धारण किया है, तो किसी ने तुलसी की माला पहन रखी है। चंदन की महक भी इन मालाओं से निकल रही है, शास्त्रों में चंदन की महिमा लिखी है।
चन्दनस्य महत्पुण्यम्, पवित्र पापनाशनम्।
आपदो हरते नित्यम्, लक्ष्म्मां तिष्ठति सर्वदा।।
मंगलनाथ क्षेत्र स्थित वैष्णव संप्रदाय के जगतगुरू आचार्य श्री रामाधाराचार्यजी महाराज का इस संबंध में मत है कि मस्तक पर तिलक लगाने से नस ठीक रहती है और भ्रम व भटकाव नहीं होता, लक्ष्य ही दिखाता है। भस्म से ठंड नहीं लगती और शरीर चुस्त रहता है। चंदन विष्णु और कुंकुम सीता का रूप है, तुलसी का महत्व तो अकथनीय है।
इसमें एक मोटा फर्क है, रामादल के बैरागी त्रिपुंड लगाने और तुलसी माला धारण करने के अलावा और कोई चीज नहीं पहनते श्रृंगार के रूप में। जबकि शिवदल के सन्यासी कांच और मोतियों की माला भी धारण कर लेते है, जो भी हो परमेश्वर को रिझाने का श्रृंगार है यह। भक्त माल खालसा के श्री रामतीर्थदास महाराज के अनुसार तिलक के चार प्रकार है- श्री जो सीधा होता है। वेदी, जिसके बीच में सफेद रंग लगाते है। लश्करी, जिसमें तीन सफेद लकीर होती है और चैथा प्रकार है चतुर्भुजी, जो दो तरफ होता है। तिलक धर्म सनातन परम्परा है, जो साधु ही नहीं गृहस्थ के लिये भी है। महंतजी कहते है कि जिस प्रकार नवरस है, उसी तरह उपासना पद्धतियां है और उन्हीं के अनुरूप संतो की श्रृंगार शैलियां है। त्यागी संत अक्सर भस्म लगाते है। कोई पहले भभूत और फिर चंदन का लेप करता है।
आचार्य अग्नि पीठाधीश्वर महामण्डलेश्वर श्री रामाकृष्णानंदजी ने बताया कि जब भस्म की बात निकली है तो यह उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि शिवपुराण सहित अन्य वेदों और उपनिषदों में इसकी महिमा का वर्णन विस्तार से किया गया है। यह जानना अत्यन्त रूचिकर होगा कि भस्म के मूलतः दो प्रकार है-पहली महाभस्म और दूसरी स्वल्प भस्म, दोनों के ही अनेक प्रकार है। पर यहां सिर्फ महाभस्म के बारे में बताना ही पर्याप्त होगा कि सामान्तया इसके तीन रूप है। श्रौत और स्मार्त, जो ब्राह्मणों के लिये और तीसरी है लौकिक भस्म, जिसका इस्तेमाल हर कोई कर सकता है। इसमें यह बंधन है कि ब्राह्मण मंत्रों के साथ भस्म लगाएंगे। दो अन्य प्रकार की भस्में भी है, जैसे कंड़ो से बनने वाली भस्म आग्नेय कहलाती है। यज्ञ से भी एक भस्म उत्पन्न होती है, जो त्रिपुंड के लिये श्रेष्ठ है।
जावला उपनिषद में यह कहा गया है कि अग्नि आदि मंत्रों द्वारा सात बार जल से भिगोकर भस्म को शरीर पर लगाएं। शिवपुराण में प्रत्येक भस्म को शरीर पर लगाने का विधि विधान दिया है और प्रायः हर भस्म के उपयोग से मोक्ष प्राप्ति, फल प्राप्ति और पाप से मुक्ति के बारे में जानकारी दी गई है। भस्म स्नान की शुद्धता का प्रतीक बताया गया है। उपनिषदों का सार यही है कि भस्म त्रिपुंड श्रेष्ठ फलदायी है।
शिवपुराण में भस्म को धारण करने की व्याख्या भी बड़े रूचिकर अंदाज में की गई है। त्रिपुंड के बारे में कहा गया है कि इसकी तीन लकीरें होती है और इसकी प्रत्येक रेखा के नौ-नौ देवता है। त्रिपुंड सिर सहित शरीर के विभिन्न अंगों में रूपायित होता है। अंकित शास्त्रों के अनुसार देखे तो रूद्राक्ष भी कम चमत्कारी नहीं है, इसका स्पर्श और जप ही अत्यंत फलदायी है, इसकी महिमा सदाशिव ने लोकोपकार के लिये पार्वती को बताई थी। सिंहस्थ में इसके सभी रूप रंग तो नजर नहीं आते है, पर जानकारी के लिये रूद्राक्ष में रंग चार प्रकार के होते है-सफेद, लाल पीले और काले। वास्तव में जो रूद्राक्ष है, वह गोठ, स्निग्ध, मजबूत मोटा और कांटेदार होता है।
यह भी कहा गया है कि 1100 रूद्राक्षधारी साक्षात शिव है, इसके लिये 550 रूद्राक्ष का मुकुट, 3-3 की लडि़यां, 360 यज्ञोपवीत में, 101 रूद्राक्षों की माला, तीन शिक्षा में, 6-6 कानों में, 11-11 कुहानियों व मणिबंधों, तीन जनेऊ में और पांच रूद्राक्ष कटि में धारण करना होंगे। संत कहते है कि वेदांे के अनुसार स्त्री व शुद्र भी इसे पहन सकते है।
यह तो हुआ इसका रंग और धारण करने की विधि। अब यह होता कितने प्रकार का है? यूं तो यह एक से 21 मुखी तक है। पर शिवपुराण में तीन से चौदह मुखी तक के रूद्राक्षों का ही उल्लेख मिलता है। इनके अनुसार त्रिमुखी रूद्राक्ष साधना-सिद्धि के लिये है, चतुर्मुखी ब्रह्म रूप है, पंचमुखी रूद्ररूपी है, छह मुखी कार्तिक रूपी है, सप्त मुखी धन प्राप्ति में सहायक, अष्टमुखी दीर्घायु के लिए, नौ मुखी भैरवों की प्राप्ति के लिये, दशमुखी सर्व मनोरथकारी, ग्यारह मुखी सूर्य के समान तेजस्वी बनाने में सहायक। इसी प्रकार तेरह और चैदह मुखी रूद्राक्षों के गुण भी बताए गए है।























