नई दिल्ली। देश के ग्रामीण विकास में एक नयी इबारत लिखने वाले यूपीए सरकार के ध्वजवाहक राष्ट्रिय कार्यक्रम महात्मा गाँधी नेशनल रोजगार गारंटी मनरेगा में संभावित बदलावों को लेकर आशंकित जाने-माने 28 अर्थशास्त्रियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम खुला पत्र लिखा है। इन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि मनरेगा के प्रावधानों को कमजोर न किया जाए बल्कि सीधे बैंक खातो में भुगतान करने की व्यवस्था कर उसमे सुधार करे । अर्थशास्त्रीयों के पत्र में कहा गया है कि 2005 में मनरेगा सभी पार्टियों की सहमति से ही पारित हुआ था। इससे उन लोगों को काफी फायदा हुआ है जो हाशिये पर जीवन गुजार रहे हैं। संप्रग शासन में ग्रामीण विकास मंत्री रहे जयराम रमेश ने भी मनरेगा में किसी तरह के बदलाव का विरोध किया है। पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी के दिलीप अब्रेउ, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया, बर्कले के प्रणब बर्धन, यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास के वी भास्कर, रांची विश्वविद्यालय के विजिटिंग प्रोफेसर ज्यां द्रेज, योजना आयोग के पूर्व सदस्य अभिजीत सेन और बोस्टन विश्वविद्यालय के दिलीप मुखर्जी शामिल हैं।
पत्र में कहा गया है कि केंद्र सरकार पहली बार राज्य सरकारों के लिए मनरेगा के तहत खर्च की सीमा तय कर रही है, जिससे मांग के आधार पर काम के सिद्धांत का उल्लंघन होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि नई सरकार मनरेगा के लिए प्रतिबद्ध नहीं है। इसलिए सरकार से आग्रह है कि इस कार्यक्रम को भलीभांति जारी रखने के लिए हरसंभव सहयोग किया जाए, ऐसी भी खबरें हैं कि सरकार मनरेगा में संशोधन कर इसे सिर्फ 200 जिलों तक ही सीमित करने जा रही है।
अर्थशास्त्रियों के अनुसार, मनरेगा में व्याप्त भ्रष्टाचार में ग्रामीणों द्वारा किये श्रम आधारित कार्यो के सीधे खातो में भुगतान से एकदम से कमी लायी जा सकती हे । मनरेगा में भ्रष्टाचार को रोकने की कवायद से दूसरे सामाजिक कार्यक्रमों के लिए भी पारदर्शिता के नए मानक स्थापित करने में मदद मिली ।
क्या हे महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा / MNREGA)
यह भारत में लागू एक रोजगार गारंटी योजना है, जिसे 25 अगस्त 2005 को विधान द्वारा अधिनियमित किया गया गया। उद्देशय एक वित्तीय वर्ष में सौ दिन के वेतन सहित रोजगार गारंटी के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की आजीविका सुरक्षा बढ़ाना है। इस अधिनियम के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में घर के वयस्क सदस्य को स्वयंसेवक के तौर पर अकुशल कार्यों में लगाया जाता है। मनरेगा समावेशी विकास को बढ़ावा देने के लिए मूल वेतन की सुरक्षा पर ध्यान देता है एवं लोकतंत्र की परिवर्तनकारी सशक्तिकरण की प्रक्रिया को ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक पहुंचाता है। जब अन्य रोजगार के विकल्प कम या अपर्याप्त हैं, तब यह रोजगार स्रोत प्रदान करके कमजोर वर्ग के लिए एक मजबूत सामाजिक सुरक्षा तंत्र प्रदान करता है.
यह योजना प्रत्येक वित्तीय वर्ष में किसी भी ग्रामीण परिवार के उन वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराती है जो प्रतिदिन 220 रुपये की सांविधिक न्यूनतम मजदूरी पर सार्वजनिक कार्य-सम्बंधित अकुशल मजदूरी करने के लिए तैयार हैं। 2010-11 वित्तीय वर्ष में इस योजना के लिए केंद्र सरकार का परिव्यय 40,100 करोड़ रुपए था। इस अधिनियम को ग्रामीण लोगों की क्रय शक्ति को बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू किया गया था, मुख्य रूप से ग्रामीण भारत में रहने वाले लोगों के लिए अर्ध-कौशलपूर्ण या बिना कौशलपूर्ण कार्य, चाहे वे गरीबी रेखा से नीचे हों या ना हों। नियत कार्य बल का करीब एक तिहाई महिलाओं से निर्मित है। सरकार एक कॉल सेंटर खोलने की योजना बना रही है, जिसके शुरू होने पर शुल्क मुक्त नंबर 1800-345-22-44 पर संपर्क किया जा सकता है। मनरेगा ग्रामीण विकास और रोजगार के दोहरे लक्ष्य को प्राप्त करता है। मनरेगा यह उल्लेख करता है कि कार्य को ग्रामीण विकास गतिविधियों के एक विशिष्ट सेट की ओर उन्मुख होना चाहिए जैसे: जल संरक्षण और संचयन, वनीकरण, ग्रामीण संपर्क-तंत्र, बाढ़ नियंत्रण और सुरक्षा जिसमें शामिल है तटबंधों का निर्माण और मरम्मत, आदि। नए टैंक/तालाबों की खुदाई, रिसाव टैंक और छोटे बांधों के निर्माण को भी महत्व दिया जाता है। कार्यरत लोगों को भूमि समतल, वृक्षारोपण जैसे कार्य प्रदान किये जाते हैं।























