मंथन. “भारत के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी की जीत ने साबित कर दिया है कि भारत का जनतंत्र अकर्मण्य अल्पसंख्यकवादी कुशासन के विरोध के लिए स्पस्ट जनादेश दे सकता है.
दुनिया भर में भारतीय लोकतंत्र लगातार ग़लत वजहों से सुर्ख़ियों में रहा है, जिनमें से कुछ हैं राजनेताओं को भ्रष्टाचार और संरक्षण देने के मामले, नीति की जगह लोकप्रियता, संसद का अक्सर स्थगित होना और मर्यादाहीन विरोध प्रदर्शन रहे हैं. पिछले एक दशक में कांग्रेस की अल्पसंख्यकवादी वंशवादी राजनीति ऐसा लगता है विश्वास और स्थिरता खो चुकी हे, के ख़िलाफ़ देश का यूवा एकजूट हो हिंदू सांस्कृतिक राष्ट्रवादी नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में उठ खड़ा हुआ.
दोनों ब्रांडों के बीच एक ठोस राष्ट्रीय राजनीति की पटकथा लिखने के संघर्ष के बीच क्षेत्रीय और जाति आधारित पार्टियों ने खाई को भरा था. मगर यह राजनीति अब ढलान पर है और गठबंधन सरकार के तहत कमज़ोर और दिशाहीन शासन का दौर ख़त्म हो गया सा लगता है जिसमे मतदाताओं ने केवल अपने संकीर्ण हितों को देखा है, जिसके बारे में आमतौर पर कहा जाता है लोग सिर्फ़ अपनी जाति को मत देने के लिए मत देते रहे हैं.
उद्यमी वर्ग सिर्फ़ यह चाहता था कि सरकार उनको लाभ उठाने के लिए निरंकुश अकेला छोड़ दे और वे शायद ही मत देते थे. कई लोग भारतीय जनतंत्र को निर्णायक और सत्तावादी शासन के तौर पर देख रहे हैं. हालांकि 2014 के आम चुनाव ने, भारत का लोकतंत्र निर्णायक रूप से गिरावट की ओर है, का मिथक तोड़ दिया है. स्थापित पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों में दशकों से मतदान एक दीर्घकालिक गिरावट की ओर रहा है, वहीं भारत में मतदान में महिलाओं की अधिकाधिक भागीदारी से, और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं की बदौलत 66.5 फ़ीसदी का रिकॉर्ड मतदान हुआ.
देश में तेज़ी से बढ़ते मध्यम वर्ग के बीच भी इसे लेकर उत्साह पाया गया. बदलाव की ज़मीन सालों से तैयार हो रही थी. चौबीस घंटे चलने वाले समाचार चैनलों ने राजनीति को और जनोन्मुख आन्दोलन में तब्दील कर दिया है, इसने भ्रष्टाचार के मामलों को बेनकाब करने में मदद भी की है.
सूचना के अधिकार ने ग़रीब भारत की जनता को नौकरशाही के ख़िलाफ़ सवाल पूछने का अधिकार देकर सशक्त बनाया है. सरकार विरोधी चले आन्दोलनो में बूढ़े और जवानों ने एकजुट होकर हज़ारों की संख्या में सड़कों पर निकलकर भ्रष्टाचार और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर विरोध प्रदर्शन किया, जिसका भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी ने इस सत्ता विरोधी लहर बखूबी लाभ उठाया. उन्होंने उन सीटों पर अपना ध्यान केंद्रित किया, जहां उनको जीतने की उम्मीद थी और लोकसभा में बड़ी चतुराई से धर्मनिरपेक्ष दलों के बहुकोणीय संघर्ष में केवल 31 फ़ीसदी मत लेकर, बड़ी संख्या में 283 सीटें जीतने में कामयाब रहे.
सबसे अहम रहा कि यह चुनाव स्थानीय मुद्दों और जाति आधारित नहीं होकर बहुसंख्यक ध्रुवीकरण का रहा, जिसमें अल्पसंख्यक वोट बैंक के अहंकार में लीन होकर जनता की लगातार उपेक्षा करने वाले नेताओ की भ्रष्ट और अकुशल सरकार को ख़ारिज कर दिया गया . जनादेश में एक ऐसे व्यक्ति मोदी में विश्वास जताया गया, जो साफ़, निर्णायक नेतृत्व, अच्छा प्रशासन और विकास का जोरदार दावा करता है.
मोदी की राजनीति अब तक केवल राज्य स्तर की होने से उनकी केंद्र की नीतिया की कार्यप्रणाली स्पस्ट होना शेष हे, वे सभी वर्गों के भारतीयों अमीर और ग़रीब, शहरी और ग्रामीण को शिक्षा, नौकरियों और इससे अधिक मौलिक मसलों एक बेहतर जीवन, बिजली और साफ़ पानी जैसी उनकी आकांक्षाएं साकार करने का मौक़ा देने का वादा करते रहे हैं जो साकार होना शेष हे.
अपने अभियान में मोदी ने एक शक्तिशाली ब्रांड बनाया है और कई एक महत्वाकांक्षी वादे किये है, बड़ी बड़ी उम्मीदों को जगाना आसान हे , लेकिन नोकरशाही को काबू कर सुशासन की कसोटी पर खरा उतरना मोदी के लिए इतना आसान नहीं होगा, उनको मिला जनादेश स्पष्ट है. भारतीय मतदाताओं ने अपने नेताओं को एक स्पष्ट संदेश दिया है कि वे भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता के बजाय शासन से समान अवसर चाहते हैं. भारत के लोकतंत्र ने अपना काम किया है , अब यह मोदी के ऊपर है कि उन्होंने जो वादे किये है वे पूरा करें.























