मंथन.इंदिरा गांधी जैसी शक्लो-सूरत की प्रियंका गांधी चुनाव-प्रचार के लिए निकलते ही सुर्खियों में छा गयीं. ऐसा कैसे हुआ और ऐसा उनके भाई और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के साथ क्यों नहीं हुआ? अगर शुरू से ही चुनाव प्रचार की कमान प्रियंका गांधी के हाथ में होती, तो क्या कांग्रेस की नियति कुछ और होती?
सबसे पहले राहुल गांधी से संबंधित सवाल पर गौर किया जाये. इस बात पर सर्वसम्मति है कि वे बड़े सोम्य, और, सामान्य बोलचाल की भाषा में कहें तो शिस्ट व्यक्ति हैं. उनके व्यक्तित्व में कोई विशेष करिश्मा नहीं है और उनके संदेशों में भी प्रभावी स्पष्टता नहीं है.
इनकी तुलना में भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व में साधारण बात को कहने का प्रभावी कौशल (‘भारत मुश्किल में है, मैं इसे बचाऊंगा’) है तथा वे अपने संदेश को दूर-दूर तक पहुंचा पाने सक्षम हैं.
ऐसे गुणों के बरक्स और साथ ही हाईटेक चुनाव अभियान में राहुल गांधी जैसे नेता का टिक पाना कठिन है. हमेशा ऐसा लगता है कि राहुल गांधी की सोच व दृष्टि सुव्यवस्थित सकारात्मक और व्यावहारिक है, लेकिन अफसोस की बात है कि उनकी भाषा भी वैसी ही है. एक पुरानी कहावत है कि चुनाव प्रचार काव्य में और शासन गद्य में किया जाना चाहिए. अगर आपके प्रचार की शैली गद्यात्मक है, तो आप मतदाताओं को नहीं रिझा पायेंगे, जैसा कि राहुल गांधी के साथ हो रहा है.
इसीलिए प्रियंका की टिप्पणियों नरेंद्र मोदी पर भारी तीब्रता से प्रहार करती नजर आई ,उनके द्वार की गयी एक-एक पंक्ति की टिप्पणियों (एक बार तो उन्होंने नरेंद्र मोदी को बचकाना कहा) से राहुल गांधी को समाचार-पत्रों के पहले पन्ने से हटाते हुए छा गयीं प्रियंका गांधी उनसे बिल्कुल अलग हैं. उनमें और नरेंद्र मोदी में एक समानता है और वह है- सीधा और साफ बोलना. एक साक्षात्कार में कथित रूप से नरेंद्र मोदी द्वारा उनको बेटी जैसा कहने पर उनकी प्रतिक्रिया में हम इस बात को देख सकते हैं. उनका जवाब- ‘मैं राजीव गांधी की बेटी हूं’- अपने अर्थ और कहने के ढंग के लिहाज से एक शानदार प्राकृतिक बयान था. नहीं लगता है कि राहुल गांधी के पास ऐसी हाजिर-जवाबी और सूझ-बूझ है. एक चुनाव प्रचारक के रूप में प्रियंका गांधी अपने भाई राहुल गांधी से काफी बेहतर हैं. अब सवाल यह उठता है कि अगर वे प्रारंभ से ही चुनाव प्रचार में लगी होतीं तो क्या इस चुनाव को प्रभावित कर सकती थीं? इसका उत्तर दो हिस्सों में हो सकता है.
कांग्रेस का जोर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के द्वारा किये गये काम को आगे ले जाने पर है. इसका अर्थ है- उच्च विकास दर हासिल करने की कोशिश करना और सामाजिक खर्च पर ध्यान देना, तथा यह भी रेखांकित करना कि भारत की कई समस्याओं का आसानी से हल नहीं निकल सकता है. वे इन नीतियों और कार्यप्रणाली को राहुल गांधी के माध्यम से जारी रखना चाहते हैं, जो मनमोहन सिंह के ही सुस्त और सावधानी भरे राजनीतिक कार्यशैली और प्रवृत्ति के जैसे बने प्रतीत होते हैं. इसलिए कांग्रेस ने उनके व्यक्तित्व को ही अपना आधार बनाया हुआ है. जहां तक मैं उनके बयानों से समझ पाया हूं, प्रियंका गांधी में वैसा ठहराव या वैसी स्थिरता नहीं है और उनके हाव-भाव इंदिरा गांधी की शैली से मिलती-जुलती है. यह वह करिश्माई शैली जिससे कांग्रेस जान-बूझकर विमुख हो गयी है. इसी कारण से कांग्रेस, जब तक अपना राजनीतिक ढंग नहीं बदलती, राहुल के साथ बंधी हुई है. प्रियंका के प्रचार कार्य में पहले से लगने से जुड़े सवाल के जवाब का दूसरा हिस्सा यह है कि प्रियंका को राहुल गांधी के प्रतिद्वंद्वी के रूप में नहीं, बल्कि सिर्फ एक चुनाव प्रचारक के रूप में देखा जाये.
ऐसा नहीं है कि उनको उनकी इच्छा (या जैसा उनसे कहा गया) से अधिक समय तक इस लड़ाई में आगे नहीं रखने के कारण उनकी पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा है. कई राजनीतिक विश्लेषकों ने इस बात को रेखांकित किया है कि प्रियंका गांधी में मसलों को समुचित तरीके से रखने और सीधे-सरल शब्दों में जवाब देने की काबिलियत है. किसी के लिए भी यह काबिलियत, और उनका स्वाभाविक आकर्षण, एक अनमोल गुण हो सकता है. यह बड़ा अजीब लगता है कि उन्हें प्रचार में नहीं लगाया गया, जबकि कांग्रेस को यह अच्छी तरह पता था कि यह चुनाव अधिकतर चुनावों से अधिक महत्वपूर्ण था, और उसे यह भी पता था कि हमारे समय के सबसे अथक और व्यावसायिक प्रतिभावान चुनाव प्रचारक एजेंसीज लगी हुयी है.






















