नईदिल्ली.सरकार ने आधार के जरिए सभी समस्याओं का एक हल निकालने की जो योजना बनाई थी, उसे सोमवार को तब बड़ा झटका लगा जब उच्चतम न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिया कि वह उन सभी आदेशों को वापस ले जिसके तहत किसी भी सेवा को हासिल करने के लिए आधार कार्ड अनिवार्य बनाया गया था। शीर्ष अदालत ने भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) को निर्देश दिया कि वह आधार कार्डधारक से जुड़ी किसी भी सूचना को कार्डधारक की इजाजत के बगैर किसी भी सरकारी एजेंसी के साथ साझा न करे।
कुछ समय से कार्ड की मांग कम हो रही है। पिछले साल सितंबर में शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया था कि जरूरी सेवाओं मसलन वेतन, भविष्य निधि, वितरण, शादी या संपत्ति के पंजीकरण के लिए आधार की जरूरत नहीं है। पिछले महीने केंद्र ने आधार को रसोई गैस ईंधन (एलपीजी) सब्सिडी से अलग कर दिया। इन सभी कदमों से आधार योजना की प्रासंगिकता लगातार निरर्थक नजर आ रही है।
आधार के जरिये नो योर कस्टरमर (केवाईसी) मसले को हल करने का वादा भी किया गया था जिससे ग्राहकों को जूझना पड़ता है। लेकिन अदालत के इस फैसले से उम्मीदों पर पानी फिरता नजर आ रहा है। अर्नस्ट ऐंड यंंग (ईवाई) में वित्तीय सेवाओं के पार्टनर और राष्ट्रीय प्रमुख अबीजर दिवाजी कहते हैं, ‘सरकार को समझना चाहिए कि इस योजना को बेहतर बनाने के लिए और सुधार करने की जरूरत है। अगर जरूरत हो तो उसे आधार में ज्यादा बदलाव लाना चाहिए ताकि इसे पूर्ण पहचान कार्ड का दर्जा मिल सके ठीक उसी तरह जैसे अमेरिका में सोशल सिक्योरिटी कार्ड है।’
यूआईडीएआईए के एक पूर्व अधिकारी कहते हैं कि सरकार ने आधार को अनिवार्य बनाने के लिए यूआईडीएआई को कभी कोई कार्यकारी आदेश नहीं दिए। उनका कहना था, ‘यूआईडीएआई नीति के मुताबिक हर व्यक्ति के लिए आधार अनिवार्य नहीं है। निजी एजेंसियों मसलन मनरेगा (महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना), एलपीजी वितरकों आदि ने इसे अनिवार्य बना दिया था। आधार अमेरिका के सोशल सिक्योरिटी कार्ड की तरह ही है जिसमें सभी तरह की रियायतों के लाभ सीधे आपके बैंक खाते तक पहुंचा दिए जाएंगे या लाभ नकद दिया जाएगा।’
उन्होंने कहा कि यूआईडीएआई नीति के तहत कार्डधारक से जुड़ी सूचनाओं को साझा करने की इजाजत भी नहीं दी गई है। उनका कहना था, ‘निचली अदालत से सूचना साझा करने के आदेशों के जुड़े मामले सामने आए। वैसे यूआईडीएआई को किसी भी एजेंसी से कार्डधारक की सूचना साझा करने का अधिकार नहीं दिया गया है।’ सरकार ने कई सामाजिक सुरक्षा योजनाओं, बैंक खातों को आधार संख्या से जोडऩा शुरू कर दिया था। इस तरह आधार संख्या को अनिवार्य बनाने की पहल शुरू हो चुकी थी।
यूआईडीएआई के अधिकारी सहमत हैं कि इस बड़ी महत्वाकांक्षी योजना के उद्देश्य पर सवालिया निशान हैं। पूर्व यूआईडीएआई अधिकारी कहते हैं कि यह देखना बाकी है कि जब एक बार संसद आधार कार्ड विधेयक पारित करती है और इसे संवैधानिक मान्यता मिल जाती है तब आधार कार्ड कितना सफल होगा। वह सवाल करते हैं, ‘क्या शीर्ष अदालत उस वक्त अपने आज के फैसले को बदलेगी?’ लोकसभा चुनावों में अब बस एक महीने का वक्त बाकी है ऐसे में यूआईडीएआई की तकदीर बेहद अनिश्चित लग रही है। कुछ राजनीतिक नेता आधार कार्ड के पक्ष में हैं जबकि कुछ नेताओं को अब भी इसे लेकर संदेह हैं।
यह सवाल अब भी बरकरार है कि क्या अगली सरकार, आधार विधेयक संसद में लाने में दिलचस्पी लेगी। इस बात पर अभी कोई स्पष्टता नहीं है। इसी वजह से उद्योग के विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि जिन लोगों के पास आधार कार्ड नहीं है, उन्हें अगली सरकार बनने का इंतजार करना चाहिए ताकि यूआईडीएआई पर कोई ठोस फैसला हो सके। जिनके पास पहले से ही कार्ड हैं, उन्हें इसे उस वक्त तक के लिए रखना चाहिए जब सरकार इसे और ज्यादा प्रासंगिक बनाने का फैसला करेगी।






















